नदियों को सुखाया हमने ही तो

हमारी नदियों का सूखना इंसानों की जीवनशैली का एक नतीजा है। हमने अपनी नदियों को सूखने और रास्ता भटकने पर मजबूर कर दिया है। क्या हम भी अपना रास्ता भटक रहे हैं?

‘वीरशैव’ शब्द का अर्थ है, बहुत बहादुर शिवभक्त। वीरशैव दर्शन में हमेशा नदियों और समुद्रों की उपमा दी जाती है। शिव की समुद्र से और लोगों की नदियों से तुलना की जाती है। उनके कहने का अर्थ यह है कि हर नदी स्वाभाविक रूप से आखिरकार समुद्र में मिल जाती है। सवाल सिर्फ यह है कि बीच में वह कितना भटकेगी।

गंगा, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी – सभी नदियाँ खतरे में हैं

मगर हमारी पीढ़ी यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि नदियों को समुद्र तक पहुंचने की जरूरत नहीं है। वे रास्ते में ही सूख सकती हैं। ऐसी है हमारी पीढ़ी।

हमारी नदियों का सूखना इंसानों की जीवनशैली का नतीजा है। ऐसा सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि ज्यादातर इंसान अपने अस्तित्व की प्रकृति को भूल गए हैं। पहले पूरे देश में सिर्फ एक नदी थी जो समुद्र तक नहीं पहुंचती थी, वह थी राजस्थान की लवणावती नदी। वह रेगिस्तान में सूख जाती है। लेकिन आजकल हमने कई नदियों को ऐसा बना दिया है जो कुछ अवधि तक समुद्र तक नहीं पहंचतीं और कई तो साल के पूरे बारह महीने समुद्र तक नहीं पहुंच पातीं। अब गंगा और सिंधु धरती की सबसे संकटग्रस्त नदियों में से हैं। कावेरी पचास साल पहले जिस स्थिति में थी, उसका चालीस फीसदी रह गई है। उज्जैन में पिछले कुंभ मेले के समय, नर्मदा से पानी पंप करके एक कृत्रिम नदी बनानी पड़ी क्योंकि क्षिप्रा में पानी ही नहीं था। छोटी नदियां मुख्य नदियों तक भी नहीं पहुंच पातीं। वे बीच में ही कहीं सूख जाती हैं। अमरावती जैसी नदियों को ‘अमर’ रहना था। जब उसमें सिर्फ पत्थर बच जाएंगे, तो वह अमर तो होगी ही!

हम खुद एक जलाशय हैं

इसका संबंध सिर्फ हमारी नदियों से नहीं है। इसका संबंध हमारे रहने के तरीके से है। क्या हम कुदरती रूप से अपने चरम स्रोत को पा लेंगे या रास्ते में भटक जाएंगे?

हमने कब तक भटके रहने का फैसला किया है? हम प्रकृति से जितना दूर जाएंगे, कई रूपों में हम अपनी प्रकृति से भी दूर चले जाएंगे। इसका विपरीत भी उतना ही सही है – हम अपनी प्रकृति से जितना दूर जाएंगे, उतना ही अपने आस-पास के हर दूसरे जीवन के प्रति असंवेदनशील होते जाएंगे।

जल कोई सामान नहीं है। यह जीवन बनाने वाला पदार्थ है। इंसान के शरीर में 72 फीसदी जल होता है। आप जल से बने शरीर हैं – आप खुद एक जलाशय हैं। और इस धरती पर नदियां जल का वो स्रोत हैं, जिनसे हमारा सबसे नजदीकी रिश्ता है। इन नदियों ने हजारों सालों से हमें गले लगाया है और पोषण दिया है। अब समय है कि हम उन्हें गले लगाएं और पोषित करें।

हमें देश में हर किसी को इस बारे में जागरूक करना चाहिए कि हमारी नदियों को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है। हमें तुरंत अपनी नदियों का दोहन करने के बारे में सोचना छोड़कर, उन्हें पुनर्जीवित करने के तरीके सोचने की जरूरत है।

नदियों को पेड़ लगाकर बचा सकते हैं

इसका सबसे आसान हल यह है कि नदी के दोनों तटों पर कम से कम एक किलोमीटर की चौड़ाई में और छोटी नदियों के लिए आधे किलोमीटर की चौड़ाई में पेड़ लगाए जाएं। लोग सोचते हैं कि पानी के कारण पेड़ होते हैं। नहीं, पेड़ों के कारण पानी होता है। अगर पेड़ नहीं होंगे, तो कुछ समय बाद नदियां भी नहीं रहेंगी। जहां भी सरकारी जमीन है, वहां हमें जंगल लगाने होंगे। जहां भी निजी जमीन है, वहां हमें मिट्टी को नष्ट करने वाली फसलों के बदले बागवानी करनी होगी। इससे किसान को भी काफी आर्थिक लाभ होगा और पांच सालों में उसकी आमदनी दोगुनी से अधिक हो जाएगी। अगर हम इस नीति को लागू कर सकें तो दस से पंद्रह सालों में हमारी नदियों में कम से कम पंद्रह से बीस फीसदी ज्यादा पानी होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published.