खुशी किसमें है?

हम खुशी पाने के लिए हर संभव कोशिश करतें हैं, और हमें खुशी का एहसास भी होता है – लेकिन फिर खुशी गायब हो जाती है। ऐसे में कहां गलती करते हैं हम?

पड़ोसी से तुलना करने की आदत
एक बार शंकरन पिल्लै को भगवान से मिलने का अवसर मिला।
भगवान ने कहा, “वत्स, तुम्हें मैं तीन वरदान देना चाहता हूँ, माँग लो।”
“जो भी चीज माँगू मिलेगी प्रभो?”
“खुशी से। मगर एक शर्त है, जो भी तुमहें मिलेगा उसका दुगुना भाग तुम्हारे मित्र को भी मिलेगा, ठीक है?” भगवान ने कहा।
शंकरन पिल्लै खुशी-खुशी घर पहुँचे।
“हे मेरे भगवान, राजमहल जैसा घर मिल जाए।”
अगले ही क्षण उनका पुराना-सा घर आलीशान महल में तब्दील हो गया।
खिडक़ी से झांककर देखो जहाँ उनका मित्र रहता है, वहाँ दो महल शान से खड़े थे। शंकरन पिल्लै का माथा ठनका।
“खैर, अब मेरे साथ आमोद-प्रमोद करने के लिए एक सुंदरी चाहिए।” माँगते ही उनके पलंग पर रूपवती रमणी लेटी हुई मिली।
शंकरन पिल्लै अपनी जिज्ञासा को नहीं रोक पाए। खिडक़ी से झाँककर देखा।
पलंग पर उनका मित्र दो सुंदरियों के बीच बैठा था। दोनों आपस में होड़ लगाते हुए मित्र पर प्यार बरसा रही थीं। शंकरन पिल्लै के लिए यह दृश्य असहनीय लगा। जल्दी-जल्दी अपना तीसरा वर भी माँग बैेठा।
“हे भगवान, मेरी एक आँख छीन लो।”
अपने पास जो वस्तु है वह अगले आदमी के पास न हो तभी लोग शंकरन पिल्लै की तरह खुश होते हैं। ये लोग अपने पास की चीज भी खोकर खुश होते हैं।
आप एक गाड़ी खरीदते हैं, मन बड़ा खुश होता है। अगर आपका पड़ोसी उससे भी बढिय़ा कीमती कार खरीद लाए तो आपकी खुशी टाँय-टाँय फिस हो जाएगी। हजार साल पहले आदमी मोटरकार के बारे में सुना तक नहीं था। लेकिन उन दिनों अपनी गाय की तुलना में पड़ोसी की गाय ज्यादा दूध दे, तो आदमी का मन बैठ जाता। गाय के बजाए अब कार आ गई है, अन्यथा बुनियादी तौर पर क्या आदमी का दुख दूर हो गया है? नहीं न?

आनंद में रहने की कला सीखनी होगी
पिछली कुछ सदियों के अंदर मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए इस पृथ्वी का चेहरा ही बदल दिया है। दूसरे प्राणियों के अस्तित्व की कोई परवाह किये बिना उसने कीट-पतंग, पशु-पक्षी सभी के स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया है।
वृक्ष-लताओं और घास-फूस को भी नहीं बक्चशा है। जमीन, पानी सभी का मनमाने ढंग से दुरुपयोग करके ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि जिसमें साँस लेना भी दूभर लग रहा है।
यह सब किसलिए? केवल इसी लोभ से न कि अपना जीवन सुखमय बने।
खुशी के आलम में मस्त होकर वह इस पृथ्वी के गोले को आतिशबाजी की तरह जला डाले, हमें कोई एतराज नहीं है। लेकिन, अपने आनंद का आस्वाद लेने की कला से अनभिज्ञ होकर पृथ्वी को लगातार ध्वस्त करते रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है।
मेरी एक बुआ थीं। आधुनिक विचारों की महिला। लेडीज क्लब की प्रमुख पदाधिकारियों में थीं। कीमती साड़ी में सज-धजकर ञ्चलब की गतिविधियों में भाग लेतीं। विमला नामक सदस्या और बुआ में हमेशा अनबन रहती थी। एक बार मीटिंग से लौटते ही बुआ फफक फफककर रोने लगीं।
क्या वे प्रधान का चुनाव हार गईं? क्या उनकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई? अथवा कौन-सा रंज है? समझ में नहीं आया।
“विमला ने आज मुझसे डटकर बदला ले लिया रे!”, रूदन के बीच में प्रलाप करते हुए बुआ ने विवरण दिया।
उस दिन बुआ एक नया नेकलस पहनकर बैठक में गई थीं। सहेली मेंबरों के पूछने पर नेकलस की खूबियों के बारे में क्या-क्या बताना है, इसकी सूची मन में तैयार कर रखी थी। लेकिन अफसोस, किसी भी मेंबर ने भूलकर भी बुआ के नेकलेस पर नजर फेरी नहीं। जान-बूझकर की गई उपेक्षा नहीं तो क्या है? जरूर उस विमला के उकसाने पर ही सभी ने मेरी बेइज्जती की है। रोते-रोते बुआ ने विमला को दो गालियाँ भी दीं।
बुआ ने वह कीमती नेकलस अपनी खुशी के लिए ही खरीदा था। लेकिन चुपके से कहीं बैठकर बुआ की खुशी को छीनना विमला के लिए सुलभ हो गया।
कैसी वाहियात बात है! आपके जीवन में भी ऐसी घटना घट सकती है।
आपकी कामना का लक्ष्य क्या है? खुशी पाना, यही न?

फिर गलती कहां हुई है?
लेकिन आप कहाँ गलती करते हैं?
आप न जाने इसके लिए क्या-क्या शर्तें लगा देते हैं। इतनी पढ़ाई करूँ तभी खुशी होगी। मेरे पास इतना धन रहे तभी खुशी होगी।
ऐसा आभूषण पहनूँ जिसे देख अगला ईष्र्या करे, तभी खुशी होगी।
सभी मौकों पर बाहरी माहौल आपकी इच्छा के अनुसार नहीं बन पाता। इच्छा का मकसद समझे बगैर, बाहरी परिस्थितियों को सौ तरह से बदलकर देखें तब भी मन को चैन नहीं मिलेगा। तब, नेकलस की इच्छा करना गलत था? गाड़ी की इच्छा करना गलत था?
नहीं, बिल्कुल नहीं। आप किसी भी चीज की इच्छा कर सकते हैं। लेकिन, खुशी पाना ही आपका मकसद रहा, इस तथ्य को भूलकर खुशी के उपादान के रूप में आपके द्वारा चुनी गई नेकलस या गाड़ी में फँस जाने से ही आपकी यह बेहाली हुई।
अपनी खुशी को दूसरों की टिप्पणियों और बाहरी परिस्थितियों के लिए गिरवी रखे बिना, यात्रा जारी रखिए। आप इस दुनिया को ही अपनी इच्छा के अनुसार बदल सकते हैं।

क्या स्त्री-पुरुष का परस्पर आकर्षण गलत है?
यौवन की देहलीज पर पुरुष का स्त्री के प्रति या स्त्री का पुरूष के प्रति जो आकर्षण होता है उससे चाहते हुए भी आप मुक्ति नहीं हो सकते।
यह सहज स्वाभाविक है। सही-गलत के मानदंड को लेकर उसका अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है।
पाश्चात्य देशों में “स्वतंत्र सेक्स” नाम से एक प्रथा का प्रचलन किया गया। परिवार के बंधन में फँसे बिना स्त्री और पुरुष मस्ती से रहना चाहते थे। जवानी के रहते यह मजेदार अनुभव रहा लेकिन ढलती उम्र में सच्चे संबंधों के अभाव में, कई लोग मानसिक रूप से उद्विग्न होकर दुखी रहने लगे। उत्तरदायित्व लिये बिना केवल सेक्स का भोग किये इन लोगों के कारण एक पूरी पीढ़ी अनाथ होकर भटक रही है।
यह न भूलिए कि शारीरिक इच्छाओं को लांघकर जीवन को जारी रखना पड़ता है। शारीरिक इच्छा में आवश्यकता से अधिक निमग्न होंगे तब भी फँस जाएँगे। उसे टालने की कोशिश करेंगे तब भी फँस जाएँगे।

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