एक के समक्ष ही समर्पण पर्याप्त है

सारे अस्तित्व के प्रति समर्पण तो तुम्हें बिलकुल असंभव है। वह तो ऐसे ही है, जैसे आदमी प्रेम करना ही न जानता हो, किसी एक आदमी को भी प्रेम न किया हो और कहे, कि मैं सारी मनुष्यता को प्रेम करना चाहता हूं। वह तो तरकीब है तुम्हारी एक से बचने की। अक्सर मैंने ऐसे लोग देखे हैं, जो एक को प्रेम करने में असमर्थ हैं। क्योंकि एक को प्रेम करना बड़ा कठिन काम है। बड़ी दूभर यात्रा है, बड़ा संघर्ष है। प्रतिपल एक चुनौती है।
मनुष्यता को प्रेम करने में कोई चुनौती नहीं है, कोई संघर्ष नहीं है। मनुष्यता कोई है थोड़ी! एक स्त्री तुम्हें ठिकाने लगा दे, एक पुरुष तुम्हें ठिकाने लगा दे। पूरी मनुष्यता तुम्हें ठिकाने नहीं लगा सकती। मनुष्यता को प्रेम मजे से करो। मनुष्यता कहीं है ही नहीं। वह तो एब्स्ट्रेक्शन है। मनुष्यता को कहां मिलोगे प्रेम करने को? कहां आलिंगन करोगे?
मनुष्यता तो सिर्फ कोरा शब्द है। मनुष्य है, मनुष्यता तो कहीं भी नहीं है। इसलिए जो लोग प्रेम करने में असमर्थ हैं, वे अक्सर मनुष्यता को प्रेम करते हैं। एक स्त्री को प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि वहां कठिनाई खड़ी हो जाती है। वहां अहंकार को झुकना पड़ता है। वहां कुछ तालमेल बिठाना पड़ता है। कुछ समझौते करने पड़ते हैं। मेरे पास ऐसे लोग आ जाते हैं, सर्वोदयी हैं, समाज-सुधारक हैं, वे पूरी मनुष्यता को प्रेम करते हैं! उनकी शकल पर प्रेम का कोई चिन्ह नहीं मालूम पड़ता।
न तो कोई पूरी मनुष्यता को प्रेम करने की जरूरत ही है। तुम एक मनुष्य को प्रेम करो। क्योंकि उससे ही तुम सीखोगे। वही सिखावन अगर इतनी गहरी हो जाए, कि तुम एक मनुष्य के भीतर इतने गहरे उतर जाओ प्रेम में, कि उसका शरीर तुम्हें भूल जाए, तो तुमने मनुष्यता के सार को पकड़ लिया। भीतर जो छिपा है अरूप, निराकार, उसे पकड़ लिया। तो फिर तुम सभी को प्रेम कर सकते हो। अभी तो तुम्हारा सभी को प्रेम झूठ होगा, तरकीब होगी, धोखा होगा।
पुराने मंदिरों के द्वार बड़े छोटे होते थे, वह ठीक था। वे प्रतीक थे, कि वहां झुक कर जाना पड़ेगा। अब तो हम जो मंदिर बनाते हैं, बड़ा द्वार बनाते हैं। और उसमें कोई घोड़े-हाथी पर भी बैठ कर जाए तो जा सकता है। बात ही भूल गए हम। बिलकुल छोटे ही द्वार होने चाहिए, जिसमें झुक कर ही जाना पड़े, जिसमें सिर को झुकाना ही पड़े। मंदिर का द्वार बड़ा नहीं हो सकता। मंदिर का द्वार छोटा होगा।
तिब्बत में जब शिष्य दीक्षित होता है, तो दिन में जितनी बार गुरु मिल जाए उतनी बार उससे साष्टांग दंडवत करना पड़ता है। कभी-कभी हजार बार। एक युवक एक तिब्बती मानेस्ट्री में रह कर मेरे पास आया। मैंने उससे पूछा, तूने वहां क्या सीखा? क्योंकि वह जर्मन था और दो साल वहां रह कर आया था। उसने कहा, कि पहले तो मैं बहुत हैरान था, कि यह क्या पागलपन है! लेकिन मैंने सोचा, कुछ देर करके देख लें।
फिर तो इतना मजा आने लगा। गुरु की आज्ञा थी, कि जहां भी वह मिले उसको झुकूं, फिर धीरे-धीरे जो भी आश्रम में थे, जो भी मिल जाते! साष्टांग दंडवत में इतना मजा आने लगा, कि फिर मैंने फिक्र ही छोड़ दी कि क्या गुरु के लिए झुकना! जो भी मौजूद है।
फिर तो मजा इतना बढ़ गया, कि लेट जाना पृथ्वी पर सब छोड़ कर। ऐसी शांति उतरने लगी, कि कोई भी न होता तो भी मैं लेट जाता। साष्टांग दंडवत करने लगा वृक्षों को, पहाड़ों को। झुकने का रस लग गया। तब गुरु ने एक दिन बुला कर मुझे कहा अब तुझे मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं। अब तो तुझे झुकने में ही रस आने लगा। हम तो बहाना थे, कि तुझे झुकने में रस आ जाए। अब तो तू किसी के भी सामने झुकने लगा है।
उस युवक ने मुझे कहा, कि बस, झुकने में ऐसा मजा आने लगा।
जर्मन अहंकार संसार में प्रगाढ़ से प्रगाढ़ अहंकार है। समस्त जातियों में जर्मन जाति के पास जैसा प्रगाढ़ अहंकार है, वैसा किसी के पास नहीं है। इसलिए दो महायुद्ध वे लड़े हैं। और कोई नहीं जानता, कि कभी भी वे युद्ध के लिए तैयार हो जाएं। यह जर्मन युवक झुकने को भी तैयार नहीं था। यह बात ही फिजूल लगती थी, लेकिन फंस गया। लेकिन जब झुका, तो रस आ गया।
एक दफा झुकने का रस आ जाए, एक दफा तुम्हें यह मजा आने लगे, कि नाकुछ होने में मजा है, मिटने में मजा है, खोने में मजा है, तो गुरु हट जाता है। गुरु बुला कर तुम्हें कह देता है, बात खतम हो गई। अब तुम मुझे परेशान न करो। क्योंकि तुम्हारे दंडवत करने से तुमको ही परेशानी होती है, तुम समझ रहे हो। तुमसे ज्यादा गुरु को परेशानी होती है। क्योंकि तुम्हारे लिए तो एक गुरु है, गुरु के लिए हजार शिष्य हैं। हजार का झुकना, और हजार के नमन को हजार बार स्वीकार करना–गुरु की भी तकलीफ है।
जैसे ही तुम तैयार हो जाते हो, कि झुकना सीख गए, गुरु कहता है, अब भीतर चले जाओ, अब दरवाजे पर मत अटको। अब मुझे छोड़ो। एक दिन गुरु कहता है, मुझे पकड़ लो अनन्यभाव से। अगर तुमने पकड़ लिया तो एक दिन गुरु कहता है, अब मुझे तुम बिलकुल छोड़ दो, क्योंकि अब परमात्मा पास है, अब तुम मुझे मत पकड़े रहो।
गुरु सदा के लिए तुमसे नहीं कहेगा, कि तुम उसे पकड़े रहो। लेकिन जिन्होंने पकड़ा है, वे ही छोड़ने में समर्थ हो पाएंगे। जिन्होंने पकड़ा ही नहीं, उनसे गुरु कैसे कहेगा छोड़ो?
एक बड़ी अदभुत किताब है–‘दस स्पेक जरथ्रुष्ट।’ दुनिया की पांच-सात श्रेष्ठतम किताबों में एक है। उसमें अंतिम वचन जरथ्रुष्ट्र अपने शिष्यों को कहता है, और वह यह है-सारी शिक्षाओं के बाद जब जरथ्रुष्ट पहाड़ की तरफ जाने लगा, अपने शिष्यों से विदा लेने लगा, उस की घड़ी आ गई विदा की . . .और घड़ी एक दिन गुरु की आएगी ही। और यह उसकी आखिरी घड़ी है। इसके बाद वह वापिस नहीं लौट सकेगा। इस शरीर में उसका होना आखिरी है। जिन्होंने ले लिया लाभ, ले लिया। यह द्वार सदा नहीं रहता। वह तो मिट ही जाएगा।
तो जरथ्रुष्ट ने कहा, मैं जा रहा हूं, तुम्हें मैं अपना आखिरी संदेश दे दूं। और वह आखिरी संदेश उसने कहा, “बीवेअर आफ जरथ्रुष्ट” – अब तुम मुझसे सावधान रहना।
शिष्य तो हैरान हुए। उन्होंने कहा, तुमसे और सावधान? तुमने ही तो सिखाया समर्पण और श्रद्धा, अब तुमसे सावधान? तुमने ही तो सिखाया सब तुम पर छोड़ देना, अब तुमसे सावधान? यह वचन बड़ा कीमती है-जरथ्रुष्ट से सावधान। लेकिन जरथ्रुष्ट यह बात उनसे ही कहेगा, जिन्होंने समग्र भाव से समर्पण कर दिया हो। तब वह कहेगा, बस! बहुत हुआ। तैर लिए मुझमें, अब आगे बढ़ो। अब मुझे मत पकड़ कर रुक जाना।

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