शिव की प्रेम दीवानी: अक्का महादेवी

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अक्का महादेवी शिव भक्त थीं। शिव को वह अपने पति के रूप में देखती थीं। बचपन से ही उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से शिव के प्रति समर्पित कर दिया था। जब वह युवा हुईं तो एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्‍हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा। राजा उनसे कई तरीकों से प्रेम निवेदन करता रहा, लेकिन हर बार वह एक ही बात कहतीं – मेरी शादी तो बहुत पहले शिव के साथ हो चुकी है। यह अक्का का कोई मतिभ्रम नहीं था, यह उनके लिए शत प्रतिशत सच्ची बात थी।

विवाह का मतलब होता है कि आप अपना शरीर, मन, और भावनाएं अपने जीवन-साथी को सौंप देते हैं।

इस संदर्भ में आज भी ऐसे बहुत से संप्रदाय हैं, जो इस तरह की बातों को निभा रहे हैं। विधिवत ईसाई नन बनने से पहले लड़कियां जीसस से विवाह करती हैं। आखिरकार एक इंसान शरीर, दिमाग और भावनाएं ही तो है। ऊर्जाओं का अनुभव तो इंसान को उतना नहीं हो पाता। अगर आप खुद को किसी चीज के प्रति प्रतिबद्ध करना चाहते हैं, तो शरीर, दिमाग और भावों को समर्पित किए बिना प्रतिबद्धता नहीं हो सकती। मीराबाई और ऐसे दूसरे भक्तों में यह पहलू शरीर, मस्तिष्क और भावों के भी आगे एक पूर्णत: अलग स्तर तक पहुंच गया था और पूरी तरह से वास्तविक बन गया था। आप केवल कुछ प्रसिद्ध भक्तों के बारे में जानते हैं, लेकिन ऐसे बहुत सारे भक्त हुए हैं जो गुमनाम हैं और जो इस अवस्था में पहुंच चुके थे। अक्का महादेवी के लिए भी यह सब वास्तविक था। उनके लिए यह कोई कल्पना नहीं थी, यह शत प्रतिशत सच था।

 

अक्का महादेवी का यह कहना कि उनकी शादी पहले ही शिव से हो चुकी है, राजा को सहन नहीं हुआ। तो एक दिन राजा ने सोचा कि ऐसी पत्नी को रखने का कोई मतलब नहीं है। ऐसी पत्नी के साथ भला कोई कैसे रह सकता है जिसने किसी अदृश्य व अनजाने व्यक्ति से विवाह किया हुआ है। उन दिनों औपचारिक रूप से तलाक नहीं होते थे। पर राजा परेशान रहने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे। उसने अक्का को अपनी राजसभा में बुलाया और राजसभा से फैसला करने को कहा। जब सभा में अक्का से पूछा गया तो वह यही कहती रहीं कि उनके पति कहीं और हैं।

अक्का महादेवी के जन्‍मस्‍थान पर स्‍थापित उनकी एक मूर्ति

 

राजा को गुस्सा आ गया क्योंकि इतने सारे लोगों के सामने उसकी पत्नी कह रही थी कि उसका पति कहीं और है। आठ सौ साल पहले किसी राजा के लिए यह सहन करना कोई आसान बात नहीं थी। समाज में ऐसी बातों का सामना करना आसान नहीं था। राजा ने कहा, ‘अगर तुम्‍हारा विवाह किसी और के साथ हो चुका है तो तुम मेरे साथ क्या कर रही हो? चली जाओ।’ अक्का ने कहा, ‘ठीक है’ और वहां से चल पड़ीं। भारत में उन दिनों किसी महिला के लिए यह सोचना भी दुश्वार था कि वह हमेशा के लिए अपने पति का घर छोडक़र जा सकती है, लेकिन अक्का वहां से चल पड़ीं।

जब राजा ने देखा कि अक्का बिना किसी परेशानी के उसे छोडक़र जा रही है, तो क्रोध के कारण उसके मन में नीचता आ गई। उसने कहा, ‘तुमने जो कुछ भी पहना हुआ है, गहने, कपड़े, सब कुछ मेरा है। यह सब यहीं छोड़ दो और तब जाओ।’ लोगों से भरी राजसभा में सत्रह-अठ्ठारह साल की उस युवती अक्का महादेवी ने अपने सभी वस्त्र उतार दिए और वहां से निर्वस्त्र ही चल पड़ी।

 

उस दिन के बाद से उन्होंने वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया। बहुत से लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि उन्हें वस्त्र पहनने चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें ही परेशानी हो सकती है, लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पूरे जीवन वह निर्वस्त्र ही रहीं और एक महान संत के रूप में जानी गईं। उनका निधन कम उम्र में ही हो गया था, लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने शिव और उनके प्रति अपनी भक्ति के बारे में सैकड़ों खूबसूरत कविताएं लिखीं।

 

उनकी भक्ति ऐसी थी कि वह हर दिन प्रार्थना करती थीं, हे शिव, मुझे आज भोजन न मिले। मैं चाहती हूं कि आपका अंश बनने के लिए मैं जिस तड़प और पीड़ा से गुजर रही हूं, वह मेरे शरीर से भी जाहिर हो। अगर मैं भोजन कर लूंगी तो मेरा शरीर संतुष्ट हो जाएगा। मेरा शरीर नहीं समझता है कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं। इसलिए मैं चाहती हूं कि मुझे भोजन ही न मिले। अगर मेरे हाथ में भोजन आए भी तो इससे पहले कि मैं उसे खाऊं, वह जमीन पर गिर जाए। अगर यह जमीन पर गिर गया तो मेरे जैसी मूर्ख उसे उठाकर खा सकती है इसलिए इससे पहले कि गिरे हुए भोजन को मैं उठाकर खाऊं, कोई कुत्ता आए और उसे ले जाए।” यह उनकी रोजाना की प्रार्थना थी।

 

भक्त पूरी तरह से अलग प्राणी होते हैं। एक सच्चा भक्त सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठता, इसलिए ऐसे लोग हमेशा समाज से अलग रहते हैं। कुछ भक्त अपने अलग तौर-तरीकों के बावजूद भी किसी तरह समाज में स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग गुमनामी में कहीं खो जाते हैं या कई बार ऐसा भी होता है कि उन्हें मार दिया जाता है। कई दूसरी सभ्‍यताओं और देशों में ऐसे लोगों की हत्या कर दी जाती है, लेकिन भारत में कम से कम ऐसा नहीं होता। भक्त इस दुनिया के नहीं होते, उनका केवल भौतिक शरीर यहां होता है। उनके जीने का तरीका और वह शक्ति, जो उनके पास होती है, पूरी तरह से किसी दूसरे लोक की होती है।

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