कौन किस योनि में जन्म लेगा??

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जब कोई व्यक्ति पुनर्जन्म लेता है तो क्या वह प्राय: उसी लिंग में वापस जन्म लेता है?

 

ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है। मेरे आसपास ऐसे कई लोग मौजूद हैं, जो पिछले जन्म में किसी दूसरे लिंग में थे। कुछ लोगों के साथ तो यह मेरा करीबी अनुभव रहा है। पुनर्जन्म की स्थिति में कोई जरूरी नहीं कि लिंग, यहां तक कि प्रजाति भी पिछले जन्म जैसी ही हो। दरअसल, ये सारी चीजें आपकी प्रकृति व प्रवृत्ति से तय होती हैं।

 

ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है, कई योगियों के साथ भी हुआ है। खासतौर पर गौतम बुद्ध के आसपास तो निश्चित तौर पर हुआ है। कई बौद्ध भिक्षु दोबारा स्त्री-रूप में पैदा हुए। ये बौद्ध भिक्षु अपने पिछले जन्मों में जब बुद्ध के पास थे तो तादाद में वहां महिलाओं की अपेक्षा पुरुष ज्यादा थे। पुरुषों की अधिक तादाद के पीछे मुक्चय रूप से सांस्कृतिक वजहें थीं। उन दिनों महिलाएं बिना पुरुष की इजाजत के घर से बाहर नहीं निकलती थीं।

जब कोई पुरुष अपनी पत्नी और बच्चों से उब जाता था तो वह घर छोडक़र बाहर निकल सकता था। लेेकिन एक महिला अपने बच्चों को तब तक छोडक़र नहीं जा सकती थी, जब तक कि उसके बच्चे बड़े न हो जाएं।

 

जो भिक्षु एक पुरुष रूप में बुद्ध के पास थे उन्होंने यह महसूस किया कि महिला भिक्षुणियां पुरुष भिक्षुओं की अपेक्षा कहीं बेहतर तरीके से खुद को बुद्ध से जोड़ पा रही थीं। इसकी वजह थी कि महिला के लिए किसी के प्रति भावनात्मक तौर पर गहराई से जुड़ पाना स्वाभाविक सी बात है। जहां पुरुष लंबे समय तक बैठ कर कड़ी साधना कर रहे थे, वहीं महिलाएं बुद्ध को निहार रही थीं और उनके चेहरे पर आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। वे बुद्ध के प्रति प्रेम से आकंठ भरी थीं और बुद्ध भी उनकी ओर सौक्वयता से निहार रहे थे। इससे पुरुषों को ईष्र्या भी होती थी।

 

साथ ही, उनके भीतर कहीं न कहीं महिलाओं की तरह बुद्ध से जुडऩे की लालसा भी थी। अपनी उसी लालसा के चलते बहुत से बौद्ध भिक्षु अगले जन्म में स्त्री-रूप में पैदा हुए। कुछ समय बाद उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि वे कौन थे और वे कैसे इस जन्म में महिला बन गए। उन्हें गहरा धक्का लगा – ‘हमने इतनी साधना की, लेकिन गौतम बुद्ध ने हमारा त्याग कर दिया! उन्होंने हमें दोबारा भिक्षु क्यों नहीं बनाया? हम यहां पति, बच्चों और परिवार के इस झमेले में फंसे हुए हैं। ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि उन्हें महिलाओं से ईष्र्या होती थी।

 

आपकी चाहत व प्रवृत्ति के आधार पर कुदरत आपको एक अनुकूल शरीर देती है। मान लीजिए आपकी चाहत लगातार कुछ न कुछ खाने की है और आप खाने के दौरान ही मर जाते हैं, तो अगले जन्म में हो सकता है कि आप किसी के घर पालतू सुअर बन कर जन्में, जो हर वक्त खाता रहता हो। लोगों को लगेगा कि सुअर के रूप में जन्म लेना अपने आप में एक सजा है। हालांकि यह कोई सजा नहीं है। कुदरत सजा या पुरस्कार के तौर पर चीजों को नहीं देखती। वह आपकी प्रवृत्तियों को देखते हुए उन्हें पूरा करने की दिशा में काम करती है। वह देखती है कि उन प्रवृत्तियों को पूरा करने में किस तरह का शरीर मददगार साबित हो सकता है, वही शरीर आप पाते हैैं। जो बौद्ध भिक्षु स्त्री-रूप में वापस लौटे यह उनकी कोई सजा नहीं थी, बल्कि यह उनकी प्रवृत्ति और चाहत का नतीजा था- चाहत उन चीजों को पाने की जो तब महिलाएं को हासिल थीं। जब वे बुद्ध से प्रेम करने व उनसे भावनात्मक रूप से जुडऩे की महिलाओं जैसी क्षमता पाने की कामना करते थे तो अनजाने में उनके भीतर स्त्री होने की आकांक्षा पैदा हो रही थी।

 

तो आपको कौन सा लिंग या रूप मिलता है, यह सब आपकी चाहत पर निर्भर करता है। इसलिए बेहतर होगा कि अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें, अपने भीतर सभी सीमाओं से परे जाने की चाहत पैदा करें, क्योंकि यही वह तरीका है, जिसमें कुदरत यह तय नहीं कर पाएगी कि वह आपके साथ क्या करे? दरअसल, जब कुदरत को पता नहीं होता कि आपके साथ क्या किया जाए तो यह आपके लिए सबसे अच्छी स्थिति होती है, क्योंकि तब आप बिना किसी खास कोशिशों के अपना काम आराम से कर सकते हैं। लेकिन जब कुरदत को पता होता है कि आपके साथ क्या करना है तो वह आपको इस खांचे या उस खांचे में रख देती है- मसलन स्त्री शरीर या पुरुष शरीर में, सुअर के रूप में या कॉकरोच के रूप में या किसी और रूप में। यह शरीर भी अपने आप में एक खांचा है, है कि नहीं?

 

अगर आप अपने भीतर इसकी-उसकी चाहत पैदा करने से बचे रहते हैं, अपनी दृष्टि शून्य पर टिकाए रखते हैं और उसी में तल्लीन रहते हैं तो कदुरत समझ ही नहीं पाती कि आपके साथ क्या किया जाए। तब वह आपको इधर या उधर नहीं धकेल सकती और न ही आपके ऊपर अपना कोई फैसला थोप सकती है। अगर कुदरत आपके बारे में फैसला नहीं ले सकती तो फिर कौन फैसला लेगा, जाहिर सी बात है, तब आपका फैसला चलेगा।

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