क्यों करते हैं हम नमस्कार

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नमस्कार करने का तरीका- दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर और सिर झुकाना, भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। इस तरीके की शुरुआत निश्चित रूप से मानव-तंत्र की गहरी समझ से हुई है।

मानव बुद्धि की ऐसी आदत है कि चाहे ऑफिस हो, सड़क हो, घर हो या कोई और जगह, जैसे ही आप किसी इंसान को देखते हैं, उसके बारे में फौरन एक राय बना लेते हैं। जैसे कि इस व्यक्ति में यह ठीक है और वह ठीक नहीं है। वह अच्छा है या वह अच्छा नहीं है। यह सुंदर है, वह बदसूरत है। ऐसी और भी न जाने कितनी राय आप बना लेते हैं। इन सब बातों के बारे में आपको सोचने की भी जरूरत नहीं पड़ती, एक पल के अंदर आप उसका मूल्यांकन कर अपना फैसला तय कर देते हैं, एक राय कायम कर लेते हैं।

आपका फैसला पूरी तरह गलत भी हो सकता है, क्योंकि वह आपके जीवन के पिछले अनुभवों पर आधारित होता है।

वे अनुभव आपको सामने वाले इंसान को उस रूप में देखने ही नहीं देते जैसा कि वह उस पल है। यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। अगर आप किसी भी क्षेत्र में प्रभावशाली तरीके से काम करना चाहते हैं तो एक बात का ध्यान रखें। जब कोई आपके सामने आए, उसे उसी रूप में लेने की कोशिश करें जैसा कि वह उस वक्त है। वह कल कैसा था, यह मायने नहीं रखता। वह इस वक्त कैसा है, यह महत्वपूर्ण है। तो पहली चीज यह है कि आप उसके आगे सिर झुकाइए। जैसे ही आप सिर झुकाते हैं, आपकी पसंद-नापसंद मंद पड़ जाती है, वे शक्तिशाली नहीं रह जातीं क्योंकि आपने उसके भीतर मौजूद सृष्टि के स्रोत को पहचान लिया है। नमस्कार करने के पीछे यही सोच होती है।

 

सबके भीतर मौजूद है वह

इस जगत का एक कण भी ऐसा नहीं है, जिसे चलाने में उस सृष्टिकर्ता का हाथ न हो। वह हर कोशिका और परमाणु के भीतर काम कर रहा है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में हमें सिखाया गया है कि अगर आप आसमान की ओर देखें, तो शीश झुकाएं, अगर आप जमीन की ओर देखें तो शीश झुकाएं। अगर आप किसी आदमी, औरत या किसी बच्चे को देखें, यहां तक कि किसी गाय या पेड़ को भी देखें, तो आप झुक जाएं। यह इस बात की भी लगातार याद दिलाता रहता है कि वह सृष्टिकर्ता आपके भीतर भी मौजूद है। अगर आप इसे जान लें, तो जब भी आप नमस्कार करेंगे, आप अपनी परम प्रकृति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ेंगे।

इसका एक दूसरा पहलू भी है। हमारी हथेलियों में आकर बहुत सी नाडिय़ां समाप्त होती हैं। आज मेडिकल साइंस ने भी इस बात को स्वीकार किया है। आपके हाथ आपकी जुबान और आपकी आवाज से ज्यादा बोलते हैं। योग में मुद्रा का एक पूरा विज्ञान है। अपने हाथों को कुछ खास मुद्रा में रख कर आप अपने पूरे सिस्टम को बिल्कुल अलग तरह से काम करने के लिए तैयार कर सकते हैं। जैसे ही आप अपने हाथों को साथ साथ रखते हैं, तो आपके सारे दोहरेपन, आपकी पसंद-नापसंद, आपकी लालसा-घृणा, सब बराबर हो जाते हैं। आप जो भी हैं, उसमें एक खास तरह की एकात्मकता आती है। सारी उर्जा एक जुट होकर काम करती है।

 

खुद को भेंट रना

नमस्कार करने के पीछे केवल सांस्कृतिक पहलू ही नहीं है, एक पूरा विज्ञान है। अगर आप साधना कर रहे हैं, तो जब भी आप अपनी हथेलियों को साथ लाते हैं, तो एक ऊर्जा प्रस्फुटित होती है। जीवन-ऊर्जा के स्तर पर आप कुछ दे रहे होते हैं। आप खुद को एक अर्पण या भेंट के तौर पर दूसरे व्यक्ति को समर्पित कर रहे हैं। देने की इस प्रक्रिया में आप दूसरे प्राणी को भी जीवंत कर देंगे और वही जीवंतता फिर आपके साथ सहयोग करेगी। अगर आप देने की अवस्था में हैं, तभी आपके आसपास की चीजें आपके लिए काम करेंगी। ऐसा हर जीवन के साथ है। अगर उसे अपने आसपास के हर जीवन का सहयोग प्राप्त हो जाए, तो उसका फलना-फूलना निश्चित है।

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