‘बनाना’ देश

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एक महत्वपूर्ण चुनाव

फिलहाल भारत एक महत्वपूर्ण चुनाव की तरफ बढ़ रहा है। कई तरह से लोग आगामी चुनाव को ‘सभी चुनावों का बाप’ कह रहे हैं, क्योकि यह चुनाव यह तय करने जा रहा है कि आने वाले समय में देश किस दिशा में और किस राह पर चलेगा। ऐसे समय यूके की एक यूनिवर्सिटी एक अध्ययन लेकर सामने आई है। यह अध्ययन बताता है कि आप जितने भद्दे और बेवकूफ लगेंगे, उतने ही आपके चुने जाने की संभावनाएं बेहतर होंगी। यह मेरी राय नहीं है, ऐसा अध्ययन का कहना है। इस अध्ययन में यह बताने की कोशिश की गई है कि आप जितने सड़कछाप लगेंगे, उतने ही ज्यादा लोगों को लगेगा कि आप भी उनमें से एक हैं। अगर आप बहुत ज्यादा तेज तर्रार या बुद्धिमान लगेंगे, तो आपको कुलीन समझकर खारिज कर दिया जाएगा। आप आम लोगों से जुड़े हुए नहीं हैं। पर देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए व देश को इस बात से रोकने के लिए कि वह दुनिया में औरों के लिए समस्याएं पैदा न करे आपको सड़कछाप होने की नहीं, बल्कि प्रतिभाशाली और अक्लमंद होने की जरूरत है। Image Courtesy – tricolor@wikimediacommons

सही लोगों का चुनाव करें

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सही लोगों का चुनाव करें

आपकी बुद्धि का दूरदर्शी होना जरूरी है, जो आज के संघर्षों से परे जाकर कल की संभावनाओं के बारे में भी सोच सके। हमें आज ऐसे लोगों को चुनने की जरूरत है, जिनमें कल की संभावनाओं का आज दोहन कर पाने की समझ व क्षमता मौजूद हो। हमें ऐसे लोगों को नहीं चुनना चाहिए, जो सिर्फ आज की समस्याओं को ही सुलझाने का दावा करें, क्योंकि हो सकता है आज की समस्याओं का कल कोई औचित्य ही न रहे।

सामूहिक मानसिकता से ऊपर उठें

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सामूहिक मानसिकता से ऊपर उठें

कभी कभी जब देश या समाज अत्याधिक समस्याओं के दलदल में गहरे धंस जाता है तो फिर वहां के लोग अपनी सामूहिक मानसिकता से ऊपर उठ कर किसी ऐसे व्यक्ति को नेता चुनते हैं, जो उनके बीच का हिस्सा न हो और जिसमें उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान नजर आए। वर्ना वे हमेशा अपने बीच से ही लोगों को चुनना पसंद करते हैं। लोकतंत्र में ये समस्याएं होती ही हैं। लोकतंत्र में औसत व्यक्ति ही दुनिया में टिक सकता है। इसमें कोई भी मेधावी और प्रतिभाशाली व्यक्ति नहीं चल सकता, यहां सब बराबर होने चाहिए। अगर हर चीज बराबर हो जाएगी तो यह एक सही समाज नजर आएगा, लेकिन इससे जबर्दस्त नाइंसाफी हो जाएगी, क्योंकि एक इंसान के तौर पर व्यक्ति जो रच सकता है, या जो बन सकता है, उसकी यह सारी क्षमता नष्ट हो जाएगी।

समान अवसर, लेकिन समानता नहीं

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समान अवसर, लेकिन समानता नहीं

लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया यह नहीं है कि ‘सभी को एक ही स्तर पर आना होगा।’ लेकिन अफसोस की बात है कि आज के संदर्भ में लोगों के दिमाग में यही भरा जा रहा है कि हर चीज और हर व्यक्ति बराबर है। जबकि ऐसा है नहीं। कभी भी दो प्राणी एक से नहीं हो सकते। हम समान अवसर तो मुहैया करा सकते हैं, लेकिन समानता नहीं पैदा कर सकते। ऐसा कभी संभव नही है।

लोकतंत्र -प्रशासन का सुरक्षित तरीका

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लोकतंत्र -प्रशासन का सुरक्षित तरीका

लोकतंत्र की लोकप्रियता की असली वजह यह रही कि इतिहास में जिन क्रूर शासकों के पास सत्ता और जिम्मेदारी रही, उन्होंने उसका दुरुपयोग किया। अगर हमारे पास कुशल व न्यायप्रिय राजाओं का इतिहास होता तो कभी भी प्रजातंत्र इतना लोकप्रिय नहीं हुआ होता। क्योंकि दुनियाभर का इतिहास तानाशाहों, क्रूर शासकों व अत्याचारी राजाओं के राज से भरा पड़ा है इसलिए हमने लोकतंत्र को चुना जो प्रशासन का अपेक्षाकृत सुरक्षित तरीका है हालांकि यह जरूरी नहीं कि यह शासन की बेहतर या ज्यादा विकसित व परिष्कृत प्रणाली हो। Image Courtesy: rajkumar1220 @flickr

एक जबर्दस्त संभावना - एक जबरदस्त जिम्मेदारी

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एक जबर्दस्त संभावना – एक जबरदस्त जिम्मेदारी

लोकतंत्र का महत्व यह है कि इसमें नेतृत्व का बदलाव बिना किसी खलबली के एक निश्चित समय-अंतराल पर होता रहता है। लेकिन इसके साथ ही बहुसंख्यक समाज के द्वारा ही नेतृत्व का चुनाव होता है। अगर आप भारतीय हैं तो आने वाले दिनों में आपके सामने एक जबरदस्त जिम्मेदारी आने वाली है, क्योंकि साल 2014 में एक दिशा तय होने जा रही है, जिस पर यह देश चलेगा। मेरे विचारों से भारत को एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक संभावनाओं से भरपूर व आर्थिक शक्ति के तौर पर संप्रभुतापूर्ण देश बनने के लिए दस से बीस साल का समय लगेगा। उसके बाद या तो चीजें नियंत्रण के बाहर हो सकती हैं या फिर हम सही मायनों में एक ऊर्जावान व विकसित देश बन जाएंगे। दोनों ही संभावनाएं सामने हैं। या तो आने वाले बीस सालों में हम एक जबर्दस्त संभावना के रूप में सामने आएं या फिर हम भी उन दूसरे देशों की तरह बन कर रह जाएं, जिन्हें आज कल ‘बनाना’ कहा जाता है।

विकासशील देश से विकसित देश बनाने का समय

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विकासशील देश से विकसित देश बनाने का समय

हिंदी में ‘बनाना रिपब्लिक’ का शाब्दिक अर्थ है, जिसे अभी बनाया जाना है। दूसरे शब्दों में अभी बनाया नहीं, बनाना है। लेकिन बनाना या बनते रहना हमेशा के लिए ठीक नहीं है। पिछले 65 सालों से हम लगातार विकासशील देश के तौर पर पहचाने जाते रहे हैं और यह विकासशीलता लगातार जारी है। यह अच्छी बात नहीं है। विकासशील केवल एक खास वक्त या कुछ समय के लिए ही होना चाहिए। लेकिन अगर यह वक्त बहुत ज्यादा खिंच जाए तो वह देश वाकई ‘बनाना देश’ यानी ‘जो बन न पाया देश’ बन कर रह जाता है। आइए हम इसे कर दिखाएं।

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