सेलेब्रिटी – क्‍या आप नहीं हैं

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हम अकसर खुद की अहमियत को समझते नहीं और दूसरों की कामयाबियों की चकाचौंध में डूब जाते हैं। इसी वजह से हम सेलेब्रिटिस को कई बार भगवान तक का दर्जा भी देते हैं। आइए जानते हैं इस विषय पर सद्‌गुरु का नजरिया।

सद्‌गुरु:

मेरे ख्याल से हर इंसान एक सेलेब्रिटी है। मैं समझता हूँ कि हर किसी की जिंदगी, चाहे जैसी भी हो, उत्सव मनाने लायक है। आप एक गरीब किसान हों या महाराजा, राष्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री, मेरे ख्याल से अगर ठीक से उस पर गौर करें, तो हर किसी की जिंदगी में उत्सव मनाने लायक कुछ-न-कुछ होता ही है।

फिलहाल हम जो छाछ पी रहे हैं, क्या उसकी खुशी नहीं मना सकते? सब-कुछ आप पर है। आप इसे अपने हाथ में ले कर इसकी खामियां गिना सकते हैं या फिर खूब मजे से पी कर उसकी खुशी मना सकते हैं। मुझे ये समझ नहीं आता कि कैसे एक इंसान सेलेब्रिटी है और दूसरा नहीं! यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि लोग किसी ऐसे इंसान को ले कर इतने रोमांचित हो जाते हैं, जिसको वे जानते तक नहीं।

खास तौर से मुझे यह देख कर हंसी आती है कि आजकल लोग फिल्म स्टार्स के इतने दीवाने हैं, जिनको उन्होंने सचमुच में कभी देखा ही नहीं। उन्होंने जो देखा है, वह है बस रोशनी और आवाज का खेल। उसके बावजूद उनके लिए ये स्टार्स, उनके साथ रह रहे लोगों से भी ज्यादा अहम हो गए हैं। लोग अमिताभ बच्चन को अपने पतियों, भाइयों और न जाने कितने लोगों से ज्यादा प्यार करते हैं, है कि नहीं? यह बड़ी हास्यास्पद बात है। इससे भ्रम की ताकत दिखती है। सिनेमा एक भ्रम पैदा करने वाली प्रक्रिया है लेकिन भ्रम की ताकत इतनी अधिक होती है कि वह लोगों के मन से असलियत को मिटा देती है।

मेरे ख्याल से समाज में चल रहा यह पूरा सेलेब्रिटी कारोबार और समाज में बड़े पैमाने पर फैल रही यह ‘पेज 3’ संस्कृति, जिसे मिडिया प्रोत्साहन दे रहा है, सही मायनों में इसलिए पनप रही है, क्योंकि लोग बहुत अधूरी जिंदगी जी रहे हैं। उनके अंदर कहीं यह उम्मीद बनी हुई है कि कहीं कोई एक आदर्श जीवन जी रहा है। किसी और का जीवन हमारे जीवन से बहुत बेहतर है। हमारी जिंदगी तो गर्दिश में है और दूसरे की जिंदगी आसमान की बुलंदियां छू रही है। यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है कि कोई फिल्म स्टार या रॉकस्टार या कोई और आपसे कहीं बेहतर जिंदगी जी रहा है। इस तरह की सोच सेलेब्रिटी संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। आपको क्या पता, हो सकता है वे बड़ी बेकार जिंदगी जी रहे हों! लेकिन यह कल्पना लोगों को मनोवैज्ञानिक दिलासा देती है और एक उम्मीद भी कि अभी एक और संभावना बाकी है। मेरे ख्याल से इस प्रकार की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया आपको राहत जरूर दे सकती है, लेकिन यह जिंदगी की समस्याओं का समाधान नहीं है।हमारे देश में भी यह सेलेब्रिटी संस्कृति बड़े पैमाने पर फल-फूल रही है। मैं देखता हूँ कि लोग अपने मनपसंद स्टार की तस्वीर या ऐसी ही उसकी कोई चीज देखते ही उन्माद में झूम-झूम कर तरह-तरह की आवाजें निकालने लगते हैं। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि हम कितने खालीपन के साथ अपनी जिंदगी जी रहे हैं!

दरअसल आपको किसी सेलेब्रिटी की नहीं, किसी रोल मॉडेल की भी नहीं, बस आत्मबोध की जरूरत है, ताकि आप यह जान सकें कि सृजन का वास्तविक स्रोत आपके भीतर धड़क रहा है। आपके अंदर जो है, उससे बेहतर सेलेब्रिटी दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। अपने भीतर से जुड़े न होने के कारण आप केवल एक मनोवैज्ञानिक धरातल पर जी रहे हैं जहां केवल कमियां ही कमियां हैं। आप अपने आसपास एक बड़ा आयाम ढूंढ़ रहे हैं, जो आपको किसी फिल्म स्टार, किसी स्पोर्ट्स स्टार या ऐसे ही किसी और में मिलता है। उनकी उपलब्धियों और उनके काम के लिए उनकी सराहना करना अलग बात है। लेकिन उनके साथ यों पेश आना मानो वे जिंदगी से भी बड़े हैं, मेरे ख्याल से अधपके दिमाग की निशानी है और यह दिखाता है कि आजकल समाज कितनी सतही जिंदगी जी रहा है!

साथ ही मुझे यह समझ नहीं आता कि आप किसी इंसान की कामयाबी को स्वीकार क्यों नहीं कर पाते? कोई कुशल अभिनेता है या संगीतकार, तो आप उसको स्वीकार क्यों नहीं कर सकते? कोई जनता का नेता है, तो आप उसको क्यों नहीं स्वीकार सकते? इस देश के साथ यही समस्या है; या तो आप उनको पूजने लगते हैं या उनको धूल चटा देते हैं। आपको किसी को पूजने की जरूरत नहीं है, न ही किसी को नीचे गिराने की, आपको बस उनको स्वीकार करने और उनको सराहने की जरूरत है।तेंदुलकर को ही ले लीजिए, क्रिकेट में वे बहुत बढ़िया बैटिंग करते हैं, अब कोई उनको बुद्ध कहने लगे, अंतर्ज्ञानी कहने लगे तो कहां तक ठीक है! यही समस्या है। कोई बढ़िया नाच कर सबका मनोरंजन करता है, इसलिए आप उसको देश का प्रधानमंत्री या किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। यह सरासर बेवकूफी है। आपको लोगों की बस उनकी शख्सियत के लिए, उनके बढ़िया काम के लिए कद्र करनी चाहिए, उनको सराहना चाहिए, इससे ज्यादा कुछ नहीं। पर या तो आप उनको धूल चटाना चाहते हैं या फिर उनको पूजना चाहते हैं। मेरे ख्याल से दोनों गलत हैं।

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