क्रिकेट विश्व कप : खिलाड़ियों को सद्‌गुरु की सलाह

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क्रिकेट विश्व कप के मुकाबले शुरू हो चुके हैं और खिलाड़ी कुछ महत्वपूर्ण मैच खेलने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। ऐसे में वे अपने खेल को सर्वोत्तम ढंग से खेलने के लिए क्या कर सकते हैं? कुछ समय पहले कुछ भारतीय खिलाड़ियों ने सद्‌गुरु के साथ चर्चा की थी।

सही निर्णय कैसे लिया जाए
अजिंक्य रहाणे के सही निर्णय लिये जाने के प्रश्न पर सद्‌गुरु का उत्तर :

सद्‌गुरु:आप एक ऐसा खेल खेलते हैं जहाँ आप की एक गलती आप को पॅवेलियन वापस भेज देती है। एक क्षण के भी छोटे से हिस्से में आप जो निर्णय लेते हैं, वह लगभग हर बात को तय करता है। ये आप के व्यक्तिगत भविष्य के बारे में हो सकता है, राष्ट्र के गौरव के बारे में भी या फिर अन्य कई विषयों के बारे में भी। ऐसे में लोग स्वाभाविक रूप से ऐसा सोचते हैं कि उन्हें ये निर्णय लेने में कड़ी मेहनत करनी है, तनावग्रस्त हो जाना है। मैं कहूंगा कि चाहे आप को पिच पर एक पल में निर्णय लेना हो या अपने जीवन में कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना हो, जिस चीज़ की सर्वाधिक आवश्यकता है वह है, ध्यान और ध्यान और ध्यान (अर्थात पूर्ण एकाग्रचित्त हो कर परिस्थिति पर नज़र बनाये रखना)। अगर, आप अपनी ध्यान देने की प्रक्रिया को ऊंचा उठाते हैं, दूसरे शब्दों में अगर आप दूसरों से बेहतर देखना सीखते हैं तो आप सही निर्णय कर सकेंगे। ऐसी कोई खास विचार प्रक्रिया नहीं है जो इसमें आप की सहायता करेगी, लेकिन अगर आप पूर्ण रूप से ध्यान देते हैं और दूसरों से ज्यादा देखते हैं, तो आप सही निर्णय लेंगे और सही कदम उठायेंगे। और ये एक सफल कदम होगा।

अंतिम ओवरों में बोलिंग कैसे की जाये
रुद्र प्रताप सिंह के मैच की अंतिम गेंद पर बोलिंग करते समय होने वाले दबाव के बारे में पूछे गये प्रश्न के उत्तर में सद्‌गुरु कह रहे हैं :

सद्‌गुरु: एक खिलाड़ी के रूप में आप खेल नहीं जीत सकते, अच्छी तरह खेलने का

परिणाम ही जीत है। तो ये अंतिम गेंद फेंकने की बात, जहाँ ऐसी परिस्थिति हो जो आप के जीवन को बना दे या बिगाड़ दे, वहाँ आप को अपनी विचार प्रक्रियाओं से अस्त-व्यस्त, अशांत नहीं हो जाना चाहिये। विचार प्रक्रिया और कुछ नहीं, आप के अंदर हो रहा एक मनोवैज्ञानिक नाटक है। आप का सम्पूर्ण ध्यान उस खेल पर होना चाहिये जो पिच पर हो रहा है, वहाँ ऐसी बहुत सी बातें हैं जो सही काम करने के लिये आप को ध्यानपूर्वक देखनी होंगी। एक गेंदबाज़ के रूप में, आप जानते हैं कि अगर आप की बाँह आप के निर्देशों को नहीं मानती तो आप एक गेंदबाज़ नहीं हो सकते। ऐसे ही, क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप का मन भी आप के निर्देशों को माने? अगर आप कहते हैं, “चुप हो जा” तो आप के मन को चुप हो जाना चाहिये।

ये बात सिर्फ अंतिम गेंद करने के बारे में ही नहीं है, आपको ऐसी स्थिति तक पहुंचाने के लिए, हम आप के जीवन में ऐसी सरल प्रक्रियाएं ला सकते हैं जिनसे आपमें ये योग्यता विकसित हो। आप बस कुछ विशेष बातों पर ध्यान दीजिये, जो लगातार हो रहीं हैं – जैसे कि हमारी सांस लेने की प्रक्रिया। उस पर ध्यान दीजिये और इस पर भी कि आप को क्या करना है। अपने विचार बन्द करने की कोशिश मत कीजिये। विचारों का स्वभाव ऐसा है कि अगर आप उन्हें रुकने को कहेंगे तो वे और भी तेज़ी से आयेंगे। मन पर हम कोई ब्रेक नहीं लगा सकते – यहाँ तो तीनों पेडल गति बढ़ाने के ही हैं। आप जिसे भी छुएंगे, बस विचारों की गति और भी बढ़ेगी। अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के विचार क्या कहते हैं? “आप क्या हैं” और “आप की मनोवैज्ञानिक गतिविधि या विचार प्रक्रिया क्या है” के बीच का अंतर यदि आप के अनुभव में स्पष्ट हो जाता है तो आप बड़ी आसानी से उन्हें दूर रख सकते हैं और वो कर सकते हैं जो ज़रूरी है।

अपेक्षाओं का बोझ
विरेन्द्र सहवाग: परिवार वाले, मित्र और अन्य लोग मुझसे इतनी ज्यादा अपेक्षाएं रखते हैं कि जब भी मैं मैदान पर उतरता हूँ, वे चाहते हैं कि मैं बहुत सारे रन बनाऊं। मैं एक बार जब जल्दी आउट हो गया तो मेरा बेटा बोला, “पापा, आप हर बार आउट क्यों हो जाते हो, हर बार आप सेंचुरी क्यों नहीं बनाते”? तो हर बार बढ़िया खेलना मुश्किल हो जाता है।

जब आप मैदान पर उतरते हैं तो आपको किसी का पति, पिता या बेटा नहीं होना चाहिए, एक भारतीय भी नहीं। आप को बस एक बल्लेबाज़ होना चाहिये।
सद्‌गुरु: जब आप मैदान पर उतरते हैं तो आपको किसी का पति, पिता या बेटा नहीं होना चाहिए, एक भारतीय भी नहीं। आप को बस एक बल्लेबाज़ होना चाहिये। आप के हाथ में बैट है और आप के पास गेंद आ रही है। आप का काम ये है कि गेंद को जिस तरह से मारा जाना चाहिये, वैसे ही आप मारें। अगर आप वहाँ एक भारतीय बन कर खड़े होंगे तो करोड़ों लोग आप के सिर पर खड़े हो जायेंगे और ये वजन आप के लिये बहुत भारी होगा, आप उसे उठा नहीं पायेंगे। अगर वहाँ आप एक पिता के रूप में खड़े रहेंगे तो आप के बच्चे आप के कंधों पर सवार हो जायेंगे और खेल खेलना आप के लिये मुश्किल हो जायेगा।

आपको इन सब को बाहर छोड़ देना चाहिये। आप जब वहाँ जाते हैं तो आप सिर्फ बल्लेबाज़ होते हैं और बस वही आप का काम है। ये सब लोग जो आपके चारों ओर हैं और आप की तरफ आशा से देख रहे हैं, वे आप को सिर्फ इसलिये पसंद करते हैं क्यों कि आप एक बल्लेबाज़ हैं। यहां 100 करोड़ से ज्यादा भारतीय हैं जिनके बारे में कोई नहीं सोचता। यहाँ कई सारे पिता हैं, ये कोई मुद्दा है ही नहीं। आप की तरफ सभी सिर्फ इसीलिये देख रहे हैं क्यों कि आप एक बल्लेबाज़ हैं। और चूंकि आप एक खास तरह के बल्लेबाज़ हैं, इसीलिये आप के बच्चे आप की ओर देख रहे हैं वरना आप के बच्चे भी टीवी देख रहे होते और किसी अन्य को पसंद करते। तो आपको समझना होगा कि आपका मूल्य इसीलिए है, क्योंकि आप एक बल्लेबाज़ हैं। तो मैदान पर आप को बस ये ही होना चाहिये। बाकी सब चीजों को आप को अलग कर देना चाहिए।

देखिये, अभी मैं लगातार, हर पल लोगों के साथ जुड़ा रहता हूँ, उनके साथ काम करता हूँ – दिन के चौबीसों घंटे, सप्ताह के सातों दिन। लेकिन अगर मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूँ तो मेरे लिये दुनिया का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता। आप को अपने जीवन में इसका कम से कम थोड़ा सा अंश ज़रूर लाना चाहिये। ऐसा करने के लिये कुछ तरीके हैं कि अगर आप बस अपनी आंखें बंद कर लें और थोड़ी देर बैठें तो आप हर किसी चीज़ को दूर कर सकें। यदि आप के रोज के जीवन में ऐसा होता है तो फिर, आप जब वहाँ जायेंगे और खड़े होंगे तो बस फिर आप हैं और गेंद है। इसमें बस भौतिकी के नियम लागू होते हैं। गेंद, बल्ला और आप – बस यही है। आप को इसके लिये भौतिक शास्त्र पढ़ने या समझने की भी ज़रूरत नहीं है। अगर आप गेंद को सही ढंग से मारेंगे तो वह सही बर्ताव ही करेगी। भौतिकी के नियमों के कारण आप असफल नहीं होंगे।

डर पर काबू पाना
रॉबिन उत्थप्पा : मैं अपने खेल से डर को कैसे बाहर रखूँ ?

सद्‌गुरु: खेल में डर कैसे आ जाता है ? आईये, इसे देखें। कृपया इसे सावधानीपूर्वक समझें :

डर हमेशा अगले क्षण का होता है, कभी भी वर्तमान क्षण का नहीं होता। क्या होगा, डर हमेशा इसके बारे में होता है। जो अभी होने वाला है या जिसका अस्तित्व ही नहीं है, हमेशा उसी के बारे में डर होता है। तो जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उसके परिणाम को आप कैसे संभाल सकते हैं? उसको संभालने का विचार ही मत कीजिये, उसको वैसे ही रहने दीजिये। पहली बात तो ये है कि जो है ही नहीं, उसको आप संभाल ही कैसे सकते हैं? दूसरी बात, अभी जो नहीं है, आप उसकी छाया को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

तो अपने डर को संभालने का प्रयत्न न करें। मूल रूप से आप ये कह रहे हैं, “मेरे विचार और मेरी भावनायें मेरे नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं। मेरी स्मृतियाँ और मेरी कल्पनाएँ मेरे नियंत्रण में नहीं हैं”। बात ये है कि पहले की असफलताओं की स्मृतियाँ हमें दुःखी करती हैं, और आने वाले समय में हो सकने वाली असफलताओं की कल्पनाएँ हमें आतंकित करती हैं। ये अभी सबसे बड़ी मानवीय समस्या है। हमें मनुष्य बनाने वाली जो सबसे बड़ी योग्यतायें हैं वे हैं हमारी बहुत बड़ी स्मृतियाँ और अद्भुत कल्पना शक्ति। तो आप के जीवन में या खेल में कोई समस्या नहीं है – समस्या ये है कि आप की कल्पनाशक्ति आप के नियंत्रण से बाहर जा रही है। इसका कारण यही है कि आप को हमेशा यही सिखाया गया है कि आप को खेल में जीतना है। कृपा कर के खेल को बस जीतने के लिये न खेलें, आप बस गेंद को मारें। आप सिर्फ लक्ष्य के साथ बंध जाते हैं, प्रक्रिया में ठीक से शामिल नहीं होते। ये प्रक्रिया ही है जो आप को एक निश्चित लक्ष्य की ओर ले जाती है। लक्ष्य बस एक कल्पना है। आप उसके साथ लड़ रहे हैं, जो अभी अस्तित्व में ही नहीं है।

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