बहुत विचार में न पड़ें

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प्रिय आत्मन्,

प्रेम । आपके दोनों पत्र मिले हैं ।

बहुत विचार में न पड़ें ।

विचार से सत्य तक जाने का कोई
मार्ग नहीं है ।

मार्ग है : ध्यान ।

उसकी ओर जितने बढें़गे, उसी मात्रा में
शान्ति, आनन्द और आत्मा की ओर गति होगी ।

ध्यान जब पूर्ण होता है, तभी अन्तस्-चक्षु
खुलते हैं ।

और, सत्य का साक्षात् होता है ।

सत्य तो सतत मौजूद है, लेकिन हम
अन्धे हैं ।

{___________}
रजनीश के प्रणाम
२-३-१९६६

[प्रति: आर० के० नन्दाणी, राजकोट, गुजरात]

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Author: superstorytimecom

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