जो खुद से संतुष्ट वह जीवित ही नहीं

मनुष्य का संघर्ष किससे है?  अपने “मैं ” से।  जो क्रांति करनी है वो खुद के अहंकार से करनी है। अहंकार से घिरा होना ही संसार में होना है और जो अहंकार के बाहर है वही परमात्मा में है। वस्तुत: वह ‘परमात्मा’ ही है।
मैं से भागने की कोशिश मत करना। उस से भागना हो ही नहीं सकता, क्योंकि भागने में भी वह साथ ही है।  उस से भागना नहीं है बल्कि समग्र शक्ति से उसमें प्रवेश करना है। खुद की अंहता में जो जितना गहरा होता जाता है उतना ही पाता है।  क्योंकि अंहता की कोई वास्तविक सत्ता है ही नहीं।
परमात्मा का प्रमाण पूछते हो? क्या चेतना का अस्तित्व पर्याप्त प्रमाण नहीं है? क्या जल की बूँद ही समस्त सागरों को सिद्ध नहीं कर देती है।
यह मत कहो कि मैं प्रार्थना में था क्योंकि इसका मतलब आप प्रार्थना के बाहर भी होते हो। जो प्रार्थना के बाहर भी होता है वो प्रार्थना में नहीं हो सकता। प्रार्थना क्रिया नहीं है। प्रार्थना तो प्रेम की परिपूर्णता है।
जीवन की खोज में आत्मतुष्टि से खतरनाक और कुछ भी नहीं। जो खुद से संतुष्ट है वो एक अर्थ में जीवित ही नहीं है और खुद से असंतुष्ट है वही सत्य की दिशा में गति करता है। स्मरण रखना कि आत्मतुष्टि से निरंतर ही विद्रोह में होना धार्मिक है।
मृत्यु से घबराकर तो तुमने कहीं ईश्वर का अविष्कार नहीं कर लिया है? भय पर आधारित ईश्वर से असत्य और कुछ भी नहीं है।
जो सदा वर्तमान में है वही सत्य है। निकटतम हो वही अंतिम सत्य है। दूर को नहीं निकट को जानो क्योंकि जो निकट को ही नहीं जानता है वो दूर को कैसे जानेगा? और जो निकट को जान लेता है उसके लिए दूर शेष ही नहीं रह जाता है।
सबसे बड़ी मुक्ति है स्वयं को मुक्त करना क्योंकि साधारणतया हम भूले ही रहते हैं कि स्वयं पर हम स्वयं ही सबसे बड़ा बोझ है।
मनुष्य को मनुष्यता बनी बनाई नहीं प्राप्त होती है। उसे तो मनुष्य को स्वयं निर्मित करना होता है। यही सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी। सौभाग्य क्योंकि स्वयं को सृजन की स्वतंत्रता भी है, लेकिन स्वयं को निर्मित किए बिना नष्ट हो जाने की सम्भावना भी।
मनुष्य को अपना विकास करके ईश्वर नहीं होना है।
साभार:(ओशो)

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