योग है संकल्प तंत्र है समर्पण

योग और तंत्र के बीच क्या कोई समानता खोजना संभव है? नहीं, यह असंभव है। यह उतना ही असंभव है, जितना कि स्त्री और पुरुष के बीच कोई समानता खोजने का प्रयत्न करना। तंत्र सर्वथा विपरीत है योग के, वह विपरीत ध्रुव है। इनके बीच तुम कोई समानता नहीं खोज सकते। और ऐसी चीजों के लिए कभी प्रयत्न भी मत करना, क्योंकि तुम अधिकाधिक भ्रमित हो जाओगे। एक जाता है पूर्व की ओर तो दूसरा जाता है पश्चिम की ओर। वे पुरुष और स्त्री की भांति हैं। उनकी मनोवृत्तियां अलग हैं। अपनी भिन्नता में वे सुंदर हैं। यदि तुम उनमें समानता करते हो तो वह असुंदर हो जाता है। एक स्त्री, स्त्री ही होती है- इतनी ज्यादा स्त्री कि वह पुरुष के लिए एक विपरीत ध्रुव बन जाती है। अपनी ध्रुवताओं में वे सुंदर हैं, क्योंकि अपनी विपरीतताओं में वे परस्पर आकर्षित हुए रहते हैं। उनकी अपनी ध्रुवताओं में वे पूरक होते हैं, लेकिन तुम समानता नहीं कर सकते। जब स्त्री और पुरुष मिलते हैं, जब उनके शरीर विलीन हो जाते हैं, तब वे दो नहीं रहते।
यही बात घटती है तंत्र और योग के साथ। तंत्र स्त्रैण है, योग पौरुषेय है। तंत्र है समर्पण, योग है संकल्प। तंत्र है प्रयासविहीनता, योग है प्रयास- जबरदस्त प्रयास। तंत्र निष्क्रिय है, योग है सक्रिय। तंत्र है धरती की भांति, योग है आकाश की भांति। वे मिलते हैं, पर उनमें कोई समानता नहीं है। शिखर पर वे मिल जाते हैं, लेकिन आधार तल पर, जहां यात्रा प्रारंभ होती है, जहां तुम सभी खड़े हो, तुम्हें मार्ग चुनना पड़ता है। मार्ग मिलाए नहीं जा सकते। और जो लोग इसके लिए प्रयत्न करते हैं, वे मानवता को भ्रमित कर देते हैं। वे बहुत हानिकारक होते हैं। मार्गों का संश्लेषण नहीं किया जा सकता, केवल अंत को संश्लिष्ट किया जा सकता है। एक मार्ग को दूसरे मार्ग से अलग होना ही होता है- पूर्णतया अलग, अपने पूरे भाव-रंग में ही अलग, अपने अस्तित्व में अलग। जब तुम तंत्र का अनुसरण करते हो तो तुम आगे बढ़ते हो तंत्र के मार्ग से। तुम प्रकृति का समग्र समर्पण होने देते हो। यह होने देना है। तुम लड़ाई नहीं करते; यह एक योद्धा का मार्ग नहीं है। तुम संघर्ष नहीं करते, तुम समर्पण करते हो, भले ही प्रकृति तुम्हें कहीं भी ले जाए। यदि  प्रकृति काम-भाव में ले जाती है, तुम काम-भाव को समर्पण कर देते हो। तुम संपूर्णतया इसमें उतरते हो, बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी पाप की धारणा के।
तंत्र के पास पाप की धारणा नहीं, कोई अपराध-भाव नहीं। मात्र सचेत बने रहो। जो घट रहा है, उसके प्रति जागरूक बने रहो। सचेत, जो हो रहा है उसके प्रति सावधान। लेकिन उसे नियंत्रित करने का प्रयत्न मत करना; स्वयं को रोकने की कोशिश मत करना। प्रवाह को चले आने दो। स्त्री में गति करो और स्त्री को गति करने दो तुम्हारे भीतर; उन्हें एक वर्तुल बनने दो। और तुम साक्षी बने रहो। इसी देखने और होने देने द्वारा, तंत्र रूपांतरण को प्राप्त कर लेता है। कामवासना तिरोहित हो जाती है। यह एक तरीका है  प्रकृति के पार जाने का, क्योंकि कामवासना के पार जाना प्रकृति के पार जाना है।
सारी प्रकृति कामयुक्त है। फूल हैं, क्योंकि वे कामभावमय हैं। समस्त सौंदर्य विद्यमान है किसी कामभाव की घटना के कारण। एक निरंतर खेल चल रहा है। पेड़ एक-दूसरे को आकर्षित कर रहे हैं, पक्षी एक-दूसरे को पुकार रहे हैं। प्रकृति काम है, और पुरुष-स्त्री के वर्तुल को पाना काम के पार जाना है। लेकिन तंत्र कहता है, काम का उपयोग सीढ़ी की भांति करो। उसके साथ संघर्ष मत करो। उसका उपयोग करो और उससे बाहर हो जाओ। उसमें से आगे बढ़ो, उसमें से गुजरो, और अनुभव द्वारा रूपांतरण को उपलब्ध हो जाओ। ध्यानपूर्ण अनुभव रूपांतरण बन जाता है।
योग कहता है ऊर्जा व्यर्थ मत गंवाना। काम से पूर्णतया दूर हट कर बाहर निकल जाना। इसमें जाने की कोई जरूरत नहीं। तुम इससे एकदम कतरा कर निकल सकते हो। ऊर्जा को सुरक्षित रखो और प्रकृति के धोखे में मत आओ। प्रकृति के साथ संघर्ष करो। संकल्पशक्ति ही बन आओ। नियंत्रित जीव हो जाओ, जो कहीं नहीं बह रहा। योग की सारी विधियां इसलिए हैं कि तुम्हें ऐसा बनाया जाए, जिससे प्रकृति में बहने की जरूरत न हो। योग कहता है प्रकृति को अपने रास्ते जाने देने की कोई जरूरत नहीं। तुम इसके मालिक हो जाओ और तुम अपने से चलो- प्रकृति के विरुद्ध। यह योद्धा का मार्ग है- ‘निर्दोष योद्धा’, जो लगातार लड़ता है और लड़ने द्वारा रूपांतरित होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *