कुछ खास परिस्थितियों में क्या झूठ बोलना उचित है?

हम अपने जीवन कई बार इस प्रश्न का सामना करते हैं कि किसी ख़ास हालात में झूठ बोलें या सच? झूठ बोलने से आख़िर नुक़सान क्या है?

प्रश्न: सद्‌गुरु, तमिल में एक कहावत है, ‘ऐसा कोई नहीं जिसने सच बोल कर ख़ुद को बर्बाद किया हो, और ऐसा कोई नहीं है जिसने झूठ बोलकर अच्छी तरह जीवन जिया हो।’ क्या यह सच है?

सद्‌गुरु: सबसे पहले, हमें सच और झूठ को परिभाषित (डिफाइन) करना चाहिए। क्या हम मौखिक(बोले जाने वाले) सच की बात कर रहे हैं जो तथ्यों को बोलने से जुड़े होते हैं, या हम सच को जीवन के पोषक के रूप में ले रहे हैं? ये बात पक्की है कि सच से जीवन का पोषण होता है। झूठ जीवन को नीचे की ओर खींचते हैं। उस मामले में यह कहावत पूरी तरह से सच है। पर अगर आप इसे मौखिक सच और झूठ के नज़रिए से देखें तो केवल तथ्य सामने रखना ही सब कुछ नहीं होता। सच का अर्थ है, जो यहाँ और अभी है, उसके सच्चे संदर्भ व अर्थ को देखना। सच को ज़ाहिर करने से कोई खो नहीं जाएगा। पर लगातार झूठ बोलने से, कोई सफल और ख़ुशहाल भी नहीं हो सकेगा।

जीवन या मौत से जुड़ी परिस्थिति हो तो झूठ बोलकर बच सकते है

कई बार जीवन और मौत से जुड़े गंभीर हालात के बीच कोई इंसान झूठ बोलने के लिए मजबूर हो सकता है और इससे उसका काम चल सकता है पर अगर आप झूठ को ही अपने जीवन का दर्शन(फिलोसोफी) या अपनी आदत बना लें, तो आपको इसकी कीमत चुकानी होगी। आपको एक-एक झूठ के लिए मोल अदा करना होगा। असत्य पर जीवन नहीं खड़ा किया जा सकता – यह पक्के तौर पर किसी काम नहीं आएगा।

झूठ से मन भ्रम में पड़ जाएगा

जब आप लगातार झूठ बोलने लगते हैं, तो कुछ समय बाद, यह आपके मन को पूरी तरह से भ्रमित कर देगा। अगर मैं बीते दिन की बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं करता तो मेरे लिए सब याद करना आसान होगा। अगर मैं कुछ भूल भी गया तो किसी ऐसे इंसान से पूछ सकता हूँ जो उस समय वहीं मौजूद था। लेकिन अगर मैं जान-बूझ कर झूठ बोल रहा हूँ तो आपसे एक बात कहूँगा, और कल किसी दूसरे को कुछ और कहूँगा, फिर तीसरे दिन कुछ और कह दूँगा और हो सकता है कि यह भी याद न रहे कि किसे क्या क्या बताया था। झूठ बोलने से आप अपने ही भीतर अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित हो जाते हैं।

आपने जो जैसा देखा, वैसा ही बोलने के लिए कोई कोशिश नहीं करना होती, बहुत सोचना भी नहीं पड़ता। पर छोटा सा झूठ बोलना भी एक अनावश्यक सोच प्रक्रिया बन जाता है, जो बेकार और भ्रामक है। अगर आप लगातार झूठ बोलते रहे, तो एक दिन आप जीवन के किसी भी आयाम को संभालने की बुनियादी खूबी खो देंगे। अगर आपने उसे अपनी जीवनशैली बना लिया है तो निश्चित रूप से आपको इसकी कीमत चुकनी होगी।

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