अध्यात्म में जीवनसाथी का सहयोग न मिले तो क्या करें?

अगर किसी आध्यात्मिक साधक का जीवनसाथी उसकी साधना में सहयोग न दे, तो संघर्ष या टकराव होना स्वाभाविक है। ऐसे में क्या करना चाहिए?

प्रश्न : सद्‌गुरु, अगर किसी का जीवनसाथी उसके योग कार्यक्रमों में जाने में राज़ी न हो, तो उसे क्या करना चाहिए और जीवनसाथी को इसकी अहमियत कैसे समझाएं?

सद्‌गुरु : अगर आप चाहते हैं कि आपका जीवन-साथी आपका सपोर्ट करें तो आपको अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया को उनके लिए लाभदायक बनाना होगा।

उनको समझ में आना चाहिए कि आध्यात्मिक प्रक्रिया की वजह से आपमें अधिक उल्लास, आनंद भर गया है। आप पहले से अधिक खुशमिजाज हो गए हैं। फिर वह ख़ुद कहेंगे, ‘जाओ, ध्यान करो। क्या तुमने आज ध्यान किया?’ लेकिन अगर आपकी आध्यात्मिकता का मतलब यह है कि आप अपने घरवालों से यह कह दें कि ‘आज से मैं खाना नहीं पकाऊंगी, मैं सिर्फ मूंगफली खिलाऊंगी। ईशा में मुझे यही बताया गया है कि भीगी हुई मूंगफली में सब कुछ होता है,’ तो यह तरीका काम नहीं आएगा।

अगर आप अपनी आध्यात्मिकता को अपने जीवनसाथी के लिए लाभदायक बनाएंगी, तो वह रोज आपसे पूछेगा, ‘क्या तुमने अपनी सुबह की क्रिया की?’ यही आपकी साधना होनी चाहिए – आपको ये ध्यान रखना होगा कि आपका अध्यात्म उन्हें फायदा पहुंचाए, आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि आप पहले से अधिक अच्छे इंसान बन जाएं। फिर वह यह सुनिश्चित करेगा कि आप अपनी सुबह की क्रिया कर रही हैं और परिवार के लिए उसके अच्छे नतीजे ला रही हैं।

लेकिन कुछ ऐसे परिवार हैं, जहां अगर कोई 15 मिनट ध्यान करने बैठे तो कोई उन्हें आकर हिला देगा, ‘अरे तुमने आंखें क्यों बंद कर लीं?’ अगर आप इस तरह की स्थिति में हैं, जहां वे किसी भी नई चीज का विरोध करते हैं, हर छोटी-छोटी चीज को लेकर वे असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो मुझे नहीं लगता कि आपका कोई परिवार है। माफ कीजिएगा, मैं बहुत कठोर बात कर रहा हूं, लेकिन इस सच का सामना करना जरूरी है। परिवार का अर्थ है कि दो या चार लोग एक-दूसरे की भलाई के लिए कोशिश कर रहे हैं। वे एक-दूसरे की खुशहाली की परवाह करते हैं। अगर ऐसी कोई परवाह आपके बीच नहीं है, तो वास्तव में आपके पास कोई परिवार नहीं है। समय आ गया है कि आप इसे पहचानें।

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