कृष्ण काले अथवा श्याम वर्ण क्यों हुए? क्या इसके पीछे कोई कथा है?

यही प्रश्न श्रीगर्गमुनि को वज्रनाभ ने किया था। वज्रनाभ श्रीकृष्ण के प्रपौत्र हैं।

इसका उत्तर गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड में हमें मिलता है।

कृष्ण का वर्ण श्याम है क्योंकि श्याम से अधिक लावण्य और कहीं नहीं।

यह श्याम होते हुए भी उज्ज्वल है। श्याम का अर्थ कुण्ठित/अभास्वर नहीं, जिसे अंग्रेजी में लोग dull कहते हैं अपितु घन में जैसे दामिनी दमकती है, वैसे ही श्रीकृष्ण की शोभा है।

अतः दक्षिण भारत में रहनी वाली श्याम सलोने गात वाली नारियों का लावण्य अनिर्वचनीय कहा जाता है। उनके मुख काक के सामान अभास्वर नहीं,अपितु घन में दामिनी के समान चमकते हैं। श्याम घन जैसे मुख पर जब प्रकाश की किरणें गिरती हैं तो बिलकुल वो चमक बिजली के सामान लगती है।

द्रौपदी का श्याम वर्ण ही उसकी खूबसूरती की पेहचान बन गयी। यमुना, तुलसी, अर्जुन, द्रौपदी, कंस, यम, शनि, दुर्योधन, ये सब श्याम थे। कंस भी बहुत सुन्दर और हट्ठा-गट्ठा नवयुवक था, जिसने कुवलयापीड को पराजित कर जरासन्ध की पुत्रियाँ अस्ति और प्राप्ति से विवाह किया। आजकल तो काले लड़के से कोई शादी नहीं करता और कर भी ले, तो नारी को ताने सुनने पड़ते हैं, “अरे इसको तो काला पति मिला”; “इससे शादी की?”; “कोई और गोरा-चिट्टा नहीं मिला?”; “पैसे हैं न इसलिए काले से शादी की होगी” इत्यादि।

हर पुराण, नाटक, महाकाव्य आदि में श्याम वर्ण विलास, सौन्दर्य, लावण्य, और रस का प्रतीक है। संस्कृत साहित्य में श्याम वर्ण का पात्र होना अर्थात् अत्यधिक मनोहरता से युत होने के बराबर है। गौर वर्ण भी उतना ही प्रशस्त है, जैसे शिव-पार्वती की जोड़ी। हमारे यहाँ खासियत है कि हम हर चीज़ की उपमा अछि चीज़ों से करते हैं। गोरे रंग की उपमा चन्द्रमा, कपूर, हंस आदि से और काले रङ्ग की रात्रि के आकाश, मेघ, नदी, नीलमणि आदि से करते हैं।

श्याम रङ्ग अगर रस और विलास का प्रतीक है तो गोरा रङ्ग स्वच्छता, शुभ, कल्याण, शान्ति, निर्मलता, मनोहरता और पवित्रता का प्रतीक है। जैसे शिव के गुण उनके वर्ण से मिलते हैं। शिव का अर्थ ही कल्याण है, वे निर्मल, सुख-दुःख से अविचलित और शान्त, श्मशान में रहते हुए भी अत्यन्त पवित्र, और सदैव भस्म लगाए हुए भी उतने ही मनोहर हैं।

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