क्या कृष्ण और बुद्ध की तुलना हो सकती है-कैसे?

क्यों नहीं? मुझे तो लगता है यदि मनुष्यों की बात की जाए तो किन्ही भी दो मनुष्यों की तुलना की जा सकती है बल्कि खालिस तुलना की बात की जाए और शब्दों पर आपकी दमदार पकड़ हो तो फिर किसी भी दो विषयों की तुलना की जा सकती है. यहाँ तक की व्हेल और ब्लैक होल की भी.

चलिए यहाँ कृष्ण और बुद्ध की बात करते हैं.

कृष्ण और बुद्ध ने अपनी युवावस्था में सबसे पहले उनका त्याग किया जो उनको बहुत प्रेम करते थे. बुद्ध ने अपनी पत्नी को छोड़ा और कृष्ण ने अपनी प्रेयसी को. समाज के लिए ये एक उदाहरण बने लेकिन क्या इन दोनों स्त्रियों के मन को कोई समझ पायेगा? एक सत्य को खोज रहा था और दूसरा सत्य को जानता था(शायद). चलो मान लेते हैं कि दोनों ने ही इसके लिए अलग तरह से अपने शौर्य का प्रदर्शन किया पर एक ने जहाँ अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन किया, अस्त्र-शास्त्रों का भी और युद्द के लिए सही तर्क गढ़े वहीँ दूसरे व्यक्ति ने शान्ति का मार्ग अपनाया और लोगों को उसका महत्व समझाने में कामयाब रहा. पर कृष्ण को जहाँ पहले ही ‘देवता’ पद मिला हुआ था बुद्ध ने अपने लिए इस शब्द के नए प्रतिमान गढ़े.

समय के साथ लोगों के आदर्श बदलते हैं और आज की भागदौड़ की जिंदगी में शांत बुद्ध कौन अपनाना चाहता है. कृष्ण के भी अच्छे गुण तो कौन ही अपनाता है भला? लड़कों की हालत ये हो गयी है कि लड़कियों के पीछे अधिक भागने पर वो ‘किशन कन्हैया’ की उपाधि पा लेते हैं. कृष्ण का ज्ञान, शौर्य और पराक्रम सम्पूर्ण रूप से कम ही लगो जानते हैं, हाँ उन्होंने १६००० रानियों से विवाह किया था, ये एक अकल्पनीय, उत्तेजित करने वाला विचार होता है लोगों के लिए.

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