आपके हिसाब से महाभारत की सबसे बड़ी श्राप या प्रतिज्ञा क्या है?

पहले तो महाभारत में मिलने वाले श्रापों व की गई प्रतिज्ञाओं की सूची बना ली जाय, फिर निर्णय लिया जाए की सबसे बड़ा कौनसा था!

श्राप:

  1. राजा परीक्षित को मिला श्राप कि एक सर्प के काटने से शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो जाएगी, जिसके कारण उनके पुत्र जनमेजय ने क्रोधवश सर्पविनाशि यज्ञ का आयोजन किया, व उस अवसर पर वैशमपायन ने उन्हें महाभारत की वो कथा सुनाई जो हम आज जानते हैं। तो निश्चय ही यह बहुत बड़ा श्राप था, जो ना केवल एक प्रतापी राजा की मृत्यु का कारण बना अपितु सहस्त्रों वर्षों से हमारा मार्ग प्रशस्त कर रही इस महान गाथा का हम तक पहुँचने का निमित्त बना।
  2. राजा पाण्डु को मिला किंदम ऋषि का श्राप, जिसने एक युवा, प्रतापी राजा का दाम्पत्य जीवन नष्ट कर दिया, उसकी पत्नियों को भी आहत किया, पाण्डु, कुंती व माद्री के राज्य छोड़ने का कारण बना व हस्तिनापुर राज्य का भविष्य ही बदल दिया। यदि पाण्डु को यह श्राप ना मिला होता तो वही राजा बने रहते, कदाचित दुर्योधन के मन में राजा बनने की इतनी तीव्र इच्छा नहीं होती, पाण्डु अपने पुत्रों के साथ वो सब नहीं होने देते जो धृतराष्ट्र ने पुत्रमोह में होने दिया, व कदाचित वह भीषण युद्ध भी ना होता। तो यह श्राप भी बहुत बड़ा था।
  3. कर्ण को मिला परशुराम का श्राप, कि वो उनके द्वारा सिखाई गई विद्या भूल जाएगा जब उसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी। इस श्राप के कारण कर्ण को कुरुक्षेत्र के युद्ध में १७वें दिन अर्जुन से युद्ध करते समय ब्रहमास्त्र के आह्वान में मुश्किल आयी, हालाँकि फिर कोशिश करने पर वो सफल हो गया। तो इस श्राप का असर कोई ख़ास होता नहीं दिखा।
  4. एक दरिद्र ब्राह्मण का कर्ण को श्राप, कि उसकी मृत्यु असहाय स्थिति में होगी। जब कर्ण की मृत्यु हुई तब उसके पास अस्त्र समाप्त हो गए थे, वो अत्यंत घायल था व थक गया था, उसके रथ का पहिया धँस गया था, अर्जुन के शक्तिशाली प्रहार के कारण कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आ रहा था, और उसकी सेना भी अर्जुन ने समाप्त कर दी थी। अतः वो असहाय स्थिति में ही था। किन्तु मृत्यु के समक्ष सभी असहाय होते हैं, तो युद्ध के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है।
  5. वसुओं का श्राप, जो उन्होंने अर्जुन को दिया भीष्म को मारने के कारण, कि जैसे अर्जुन ने अपने पिता तुल्य पितामह का वध किया है वैसे ही उसका वध उसके पुत्र के हाथों होगा। जब इस श्राप का पता नागकन्या उलूपी को चला तो उन्होंने अर्जुन के साथ मिलकर एक योजना बनाई, और उसके अंतर्गत अर्जुन का वध उसके पुत्र भभरूवाहन के हाथों करवा दिया। इसके पश्चात उलूपी ने उसे एक विशिष्ट नागमणी के द्वारा पुनः जीवित कर दिया। इससे श्राप पूर्ण भी हो गया व अर्जुन के प्राण भी बच गए। तो इस श्राप का असर कुछ ख़ास नहीं हुआ।
  6. कृष्ण का श्राप, जो उन्होंने अश्वत्थामा को दिया सोते हुए पाँचाल खेमे का विनाश करने व कुरु स्त्रियों के गर्भ पर ब्रह्मशिर अस्त्र फेंकने के लिए। इस श्राप से अश्वत्थामा को अपने रिसते, पके हुए व कभी ठीक ना होने वाले मवादी घाव को लेकर सहस्त्रों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकना था। उसके शरीर से आती दुर्गन्ध के कारण कोई मनुष्य उसके पास नहीं आएगा व वो अपना चिरंजीवी जीवन अकेला व दर्द से तड़पते हुए व्यतीत करेगा। किसी भी मनुष्य के लिए यह अत्यंत पीड़ाजनक व असहनीय श्राप है, किन्तु इसका असर मात्र अश्वत्थामा तक ही सीमित है, इससे अन्य कोई प्रभावित नहीं हुआ।
  7. गांधारी का श्राप, जो उन्होंने कृष्ण को दिया युद्ध समाप्ति के पश्चात, कि उनके समस्त यदु कुल का ३६ वर्ष के पश्चात अंत हो जाए। इस श्राप के कारण अक्रूर, प्रद्युमण, शांब, अनिरुद्ध, चरुदेशन, सात्यकी, कृतवरमा जैसे प्रतापी योद्धा कुछ ही देर में समाप्त हो गए, व कृष्ण व बलराम ने भी शरीर त्याग दिया। अर्जुन के द्वारका पहुँचने के पश्चात वसुदेव ने भी शरीर त्याग दिया। अर्जुन के सभी को लेकर नगर से निकलते ही विशाल, सम्रद्ध व सुंदर द्वारका भी समुद्र में समा गई। यादवों की कई स्त्रियों को लुटेरे उठा कर ले गए व द्वापर युग का सर्वश्रेष्ठ योद्धा अपने गांडीव पर प्रत्यंचा भी मुश्किल से चढ़ा पाया, व उसके समस्त दिव्यास्त्र लोप हो गए व अक्षय तुणीर भी ख़ाली हो गए। कृष्ण की कुछ पत्नियों ने आत्मदाह कर लिया व कुछ ने वानप्रस्थ ले लिया। इसके पश्चात अर्जुन व पांडव इतने दुखी हुए कि द्रौपदी समेत पांडवों ने राज्य छोड़ वानप्रस्थ ले लिया व हिमालय पार करते हुए युधिष्ठिर को छोड़ अन्य मृत्यु को प्राप्त हो गए। कृष्ण के शरीर त्यागने से द्वापर का अंत हो गया व कलियुग आरम्भ हो गया। तो इस श्राप का असर भी बहुत विस्तृत व गहरा था।

अब इनमे से सबसे बड़ा कौनसा था? ३,४,५ और ६ के असर व्यक्तिगत थे व सीमित भी, इसलिए गणना में नहीं आते। ७वाँ विधि का विधान व युगांत का माध्यम था। इसलिए दूरगामी परिणाम होते हुए भी इसे ‘श्राप’ नहीं कह सकते, क्योंकि यह समय का चक्र व काल भी था। अब बचे १ और २। पाण्डु के श्राप के परिणाम इतिहास बदलने वाले हैं व परीक्षित के श्राप के परिणाम इतिहास बनाने वाले। एक ने युद्ध कराया व दूसरे ने इस कथा को हम तक पहुँचाया। मुझे यह कथा अत्यंत प्रिय है, इसलिए मेरे लिए सबसे बड़ा श्राप परीक्षित का था, जिसके कारण आज हम इस कथा को जानते हैं व इसके ऊपर चर्चा कर रहे हैं।

प्रतिज्ञाएँ:

  • भीष्म प्रतिज्ञा। इस प्रतिज्ञा का तो वर्णन ही ‘भीष्म’ है, जिसने देवव्रत को भीष्म बना दिया। अपने वृद्ध पिता का विवाह सत्यवती से कराने हेतु देवव्रत ने प्रतिज्ञा की कि वो स्वयं कभी हस्तिनापुर के सिंहासन पर नहीं बैठेंगे, और आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे जिससे उनके वंशज हस्तिनापुर सिंहासन पर अपना अधिकार ना समझें। इससे सत्यवती के पुत्र ही राजा बनेंगे। विवाह के लिए सत्यवती के पिता की यही शर्त थी, जो युवराज देवव्रत ने यौवन में पदार्पण करते ही अपने जीवन के सभी सुखों की बलि देकर पूर्ण की। और उनके वृद्ध पिता ने उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दे अपने कर्तव्य को पूर्ण समझा व झटपट विवाह भी रचा लिया! और इसी प्रतिज्ञा ने कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध को जन्म दिया।
  • युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा। राजसूय यज्ञ में शिशुपाल वध के कारण पड़े विघ्न का प्रकोप युधिष्ठिर ने जब व्यास से पूछा, तो व्यास ने उन्हें बताया कि इस अपशगुन से गृह कलह हो सकती है व इसका असर १३ वर्षों तक रहता है। इस पर युधिष्ठिर ने प्रतिज्ञा की कि वो ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जिससे हस्तिनापुर से उनके सम्बंध बिगड़ें, व अपनी ओर से शांति व सौहार्द बना रहे इसकी पूर्ण कोशिश करेंगे। इसी प्रतिज्ञा से बँधे युधिष्ठिर द्यूत खेलने चल दिए, दुर्योधन के हर दाँव को स्वीकार करते गए, अपना व अपने भाइयों व पत्नी का अपमान भी सहन कर लिया, सब कुछ पुनः मिल जाने के पश्चात फिर से द्यूत खेलने को राज़ी हो गए, सब कुछ हार के वन को चले गए व १३ वर्षों के उपरांत भी अंत तक शांति चाहते रहे।
  • भीम की प्रतिज्ञाएँ: भीम ने चार मुख्य प्रतिज्ञाएँ की थीं।
    1. दुशासन की छाती का लहू पीने की व उसका वो हाथ काटने की जिसने द्रौपदी के केश पकड़े थे।
    2. दुर्योधन की वो जाँघ तोड़ने की जो उसने अभद्र रूप से द्रौपदी को दिखाई थी, व उसके शीश पर अपना पाँव रखने की।
    3. दुर्योधन व उसके सभी भाइयों का वध करने की।
    4. भीम को नपुंसक कहने वाले का वध करने की।

भीम ने पहली तीनों प्रतिज्ञाओं को पूर्ण किया, व चौथी के पूर्ण होने का अवसर नहीं आया क्योंकि भीम को नपुंसक कहने का साहस किसी में नहीं था।

  • अर्जुन की प्रतिज्ञाएँ: अर्जुन ने मुख्य रूप से तीन प्रतिज्ञाएँ की थीं।
    1. कर्ण का वध करने की।
    2. जयद्रथ का १४वें दिन सूर्यास्त से पहले वध करने की अन्यथा आत्मदाह करने की।
    3. जो व्यक्ति उसे गांडीव किसी और को देने को कहे उसका वध करने की।

अर्जुन ने पहली दोनों प्रतिज्ञाएँ पूर्ण कीं, और युधिष्ठिर को अपशब्द कहके तीसरी भी, क्योंकि कृष्ण के अनुसार अपने ज्येष्ठ का अपमान उसका वध करने के बराबर है।

  • सहदेव की प्रतिज्ञा, कि वो शकुनि का वध करेंगे। उन्होंने यह प्रतिज्ञा युद्ध के अंतिम दिन पूर्ण की।
  • कर्ण की प्रतिज्ञा, कि वो अर्जुन का वध करने तक किसी भी ब्राह्मण को ख़ाली हाथ नहीं लौटाएगा व अपने पाँव भी नहीं धोएगा। इस प्रतिज्ञा पर वो जीवन के अंत तक अटल रहा किन्तु पूर्ण नहीं कर पाया।
  • कृष्ण की प्रतिज्ञा, कि वो कुरुक्षेत्र के युद्ध में कोई शस्त्र नहीं उठाएँगे। उनकी यह प्रतिज्ञा लगभग टूट गयी जब अर्जुन के भीष्म से बेमन से लड़ने से क्रुद्ध हो वो रथ से कूद चाबुक उठा कर भीष्म की ओर दौड़ पड़े। तब अर्जुन ने उनके पैरों को पकड़कर भूमि पर घिसटते हुए उन्हें रोका व उनसे क्षमा माँग उन्हें उनकी प्रतिज्ञा स्मरण कराई, व वचन दिया कि वो भीष्म से अपनी पूर्ण शक्ति के साथ युद्ध करेंगे। कृष्ण अपनी प्रतिज्ञा को तब भी भूलने को तैयार थे जब अर्जुन ने जयद्रथ को सूर्यास्त से पहले मारने अन्यथा आत्मदाह करने की प्रतिज्ञा की। अर्जुन की इस प्रतिज्ञा ने सबके होश उड़ा दिए थे। कृष्ण ने अपने पुत्र की मृत्यु से दुखी अर्जुन को तो प्रेमपूर्वक एक बालक की भाँति सुला दिया, किन्तु उसकी चिंता में स्वयं नहीं सो पाए। उस रात कदाचित अर्जुन को छोड़कर पूरे पांडव शिविर में कोई नहीं सोया! इस अवसर पर अर्जुन की प्राणरक्षा को लेकर कृष्ण इतने विचलित हो गए थे कि उन्होंने अपने सारथी दरुक को अपना स्वयं का रथ तैयार रखने को कहा कि यदि अर्जुन को कुछ हो गया तो वे स्वयं युद्ध में योद्धा की तरह प्रवेश कर समस्त कौरवों का विनाश कर देंगे। अर्जुन-रहित धरती पर उन्हें एक क्षण के लिए भी जीवित रहना स्वीकार्य नहीं था।
  • द्रौपदी की प्रतिज्ञा, कि वो अश्वत्थामा को दंड मिलने तक क्षत-विक्षत पाँचाल के खेमे में धरती पर प्राय मुद्रा में बैठी रहेगी। यह सुनकर भीम अति शीघ्रता से अश्वत्थामा को दंडित करने उसके पीछे गया, व अर्जुन व कृष्ण अनिष्ट की आशंका से उसके पीछे। अन्ततः अश्वत्थामा के माथे से उसकी मणि निकालकर अर्जुन ने भीम को दी, व भीम ने द्रौपदी को, जिसने इसे दंड स्वरूप स्वीकार कर युधिष्ठिर को दे दिया।

अब इन प्रतिज्ञाओं में सबसे बड़ी कौनसी है? वही जिसके असर मात्र व्यक्तिगत ना होकर दूरगामी थे, और वो थी भीष्म प्रतिज्ञा। इस प्रतिज्ञा के कारण कुरुओं की सबसे योग्य व्यक्ति को राजा बनाने की परम्परा टूट गई व आगे की पीढ़ियाँ राज सिंहासन को कर्तव्य के स्थान पर अधिकार समझने लगीं। इसी सोच का परिणाम थे धृतराष्ट्र व दुर्योधन, क्योंकि सबसे योग्य व्यक्ति तो सिंहासन का सेवक बनकर रह गया था। भीष्म की यह प्रतिज्ञा युद्ध का मूल कारण बनी, अतः इसका प्रभाव सबसे अधिक था।

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