जीवन का उद्देश्य अगर मुक्ति है तो लोग प्रेम के बंधन में क्यों पड़ते हैं?

आप बताये प्रेम क्या है—ये जो लोग बोलते हैं कि तुम मुझे नहीं मिले तो मै मर जाऊंगा/जाऊंगी। या, ये की आपने किसी को अपनी तस्वीरे नहीं भेजी या फिर उन्हें अपने निकट नहीं आने दिया तो ब्रेक अप की धमकी देना। या फिर माँ बाप का सिर्फ अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपने बच्चे की शादी वह करवा देना जहाँ वह शायद कभी खुश ना रहे या फिर शायद घुट घुट कर मर ही जाये।ये सब जो आज कल लोग करते हैं ये प्रेम नहीं है। ये सिर्फ ईमोशनल कमजोरियां हैं ।लोग एक दूसरे पर अपना आधिपत्य स्थापित करने पर तुले हुए हैं। यही बंधन है क्योंकि यहाँ प्रेम होता ही नहीं है।सिर्फ प्रेमी प्रेमिका ही नहीं..माँ बाप भी यही काम करते हैं।वो बच्चो को अपनी जागीर समझते हैं क्योंकि उन्होंने बच्चो को जीवन दिया है इसीलिए वो चाहते की उनका बच्चा वही करे जो वो चाहते है।और अपने इसी मोह को वो प्रेम का नाम देते हैं।वो डरते हैं कि यदि उनका बच्चा उनसे दूर ही गया तो उनका बुढ़ापा कैसे काटेगा।कौन उनका ख्याल रखेगा।

सच कहें तो प्रेम बचा ही नहीं है ।सिर्फ मोह है सबको अपने आप से और इसीलिए वो हर उस व्यक्ति को जो भी उनकी इच्छाओं को पूरा कर सकता है। उसे बांध कर रखते हैं या तो इमोशनल धमकी दे कर या फिर उसके मन मे कोई डर पैदा कर के। उम्मीद करती हूं आप समझ गए होंगे की मोह बांधता है इंसान को..प्रेम नहीं।

प्रेम एक बहुत ही पवित्र भावना होती है जिसमे ‘मै’ से पहले किसी और व्यक्ति का ख्याल आता है ।यहाँ हम उसे खोने या पाने से ज्यादा उसकी खुशी और उसके दुःख के बारे मे सोचते हैं।हम उसको आज़ाद कर देते हैं अपनी खुशियां चुनने के लिए।हम सदैव उसके साथ रहते हैं चाहे उसके पास रहे या ना रहे।प्रेम आज़ादी देता है और मोह बांधता है। क्योंकि मोह हमारी खुशियों और आकांक्षाओ पर टिका हुआ है और प्रेम सामने वाले की।प्रेम में हम अपने सुख दुख के बारे मे नही सोचते हैं। सिर्फ दुसरो के बारे में सोचते है।

और जो आपने जीवन के उद्देश्य-मुक्ति की बात की है।तो मुक्ति का मतलब है अपनी इच्छाओं, डर, कामनाओ, बुरी भावना और ईर्ष्या से मुक्ति। ना कि इंसान को छोड़ कर दूर जाकर हिमालय पर बस जाना। जैसे जैसे आप अपने स्वार्थ और अपनी आकांक्षाओ को अपनों पर थोपना बंद कर देंगे उन्हें उनका जीवन जीने के लिए आज़ाद कर देंगे।आप देखेंगे कि आप स्वयं भी मुक्त हो गए हैं। और अब आप प्रेम करते हैं आपके अपनों से भी और हर व्यक्ति से क्योंकि अब आप स्वयं प्रेम बन गए हैं।प्रेम स्वतः ही आपके अंदर से बहेगा और आप आज़ाद भी रहेंगे।

ये सारी बहुत ही गहरी बाते हैं।मुझे बिलकुल नहीं पता की मैं अपनी बात समझाने में कितनी सफल रही हूँ।पर अब तक मेने गीता से जो भी ज्ञान अर्जित किया है उसका सार यही है।उम्मीद करती हूं आपको शायद आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया हो।

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