जब कामुकता से जुड़ी लालसाएं भी खत्म हो जाती हैं

दैहिक जरुरतों को दबाने की आवश्यकता ही क्या है? ओशो याद दिलाते हैं कि एक दिन यह जरूरत खुद ही खत्म हो जाएगी.
जिज्ञासु: ओशो, अंतत: इसने मुझे भी दुख पहुंचाया है. सेक्स और रिलेशनशिप ने मुझे तोड़ दिया है. अभी जैसे ही मैने महसूस किया कि मैं एक मधुर रिश्ते से जुड़ा था कि अचानक से उसे बर्दाश्त करना मेरे लिए मुश्किल हो गया. सभी के लिए तृष्णा और आत्मीयता खत्म हो गई. अपने दिल में ढ़ेर सारा प्यार लिए मैं खुद में इतना अच्छा और आराम महसूस कर रहा हूं लेकिन इस प्यार की कोई दिशा नहीं है. ओशो, क्या आप बता सकते हैं कि क्या हो रहा है?
ओशो: आप यहां अपने अहंकार से अलग रूप में नहीं हैं बल्कि एक घटना का हिस्सा हैं. इसलिये जब भी कुछ शुरु होने वाला होता है तो यह कई अन्य लोगों के साथ होने के लिए भी बंधा है. यह एक श्रृंखला प्रभाव के जैसा होना है. यह संसार में नहीं होता है क्योंकि लोग गहराई से एक दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं. यहां समुदाय है लेकिन कोई सहभागिता नहीं है. और यही वह समुदाय है जहां आप सब समान हैं और कोई भी किसी का प्रतियोगी नहीं रहा है. यही वो समुदाय है जहां किसी भी प्रकार का संघर्ष नहीं हो रहा है. केवल एक जबर्दस्त संगीत और चुप्पी है जो बिना एहसास दिलाये आपको एकता में बांध रहा है. आप एक संपूर्णता में गहरी नींद में सो रहे हैं. यह पूर्णता एक नया स्वास्थ्य, एक नई खुशी और एक नये प्रकार का प्रेम लेकर आता है.
सेक्स एक प्राचीन बात है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है, बस यह केवल बहुत पुराना हो चुका है. और अब जब आप अधिक परिपक्वता से आगे बढ़ते हैं तो आप कुछ बड़ा, बेहतर और उत्कृष्ट तलाशते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि सेक्स आपको नीचे ला देता है जो कि एक बचकाना और थोड़ा अपरिपक्व व्यहार को दर्शाता है. यह अच्छा है. एक वक़्त होता है जब आप मूर्ख बन सकते हैं. और जब आप ध्यान करते हैं तो आपमें परिपक्वता और एकाग्रता जल्दी आती है. आपकी जागरूकता बढ़ जाती है और हर रोज आपकी सोच हर चीजों के मामले में और स्पष्ट हो जाती है. और सेक्स वह पहली चीज होती है जो आपकी इस जागरूकता का शिकार होती है और बाकी अन्य चीजों का अनुसरण भी इसी प्रकार होगा.
जीवन से सेक्स का खत्म होना बिल्कुल वैसा है जैसे कि अगर पेड़ अपनी जड़ खो दे तो शाखाएं हरी भरी नहीं रह पाएंगी. उसपर फूल कभी नहीं लगेंगें. वास्तविकता में वह पेड़ टहनी के बिना मर जाता है. कुछ दिनों बाद हो सकता है शायद यह वापस से खड़ा हो जाए तो कुछ और दिन पत्तियां हरी भरी रहेंगी और कुछ और दिन बाद फूल भी शायद पेड़ों पर लग आये. लेकिन मूल बात यह है कि जैसे ही हम पेड़ की जड़ काटते हैं, यह मर जाता है. आपका क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा, हीन भावना, श्रेष्ठ भावना, सभी प्रकार की तंत्रिकाएं और मानसिकताएं तो केवल शाखाएं हैं.
परिपक्व दृष्टिकोण
ये सारी चीजें स्वंय ही खत्म हो जाएंगी अगर एक बार आप इससे लड़े बिना सेक्स से परे चले जाते हैं. और यही एक मूलभूत अंतर से जो मुझे अन्य सभी धर्मों से अलग करता है. उन सब धर्मों की कोशिश सेक्स की भावना को खत्म करने की होती है. लेकिन मैं तुम्हें इसे खत्म करने को नहीं कह रहा हूं. मैं तुम्हें और अधिक परिपक्व और चिंतनशील होने को कह रहा हूं. और जब आप परिपक़्व नहीं होते हैं तो सेक्स पूरी तरह से सही है. बिंदास रहें और इस पल के आनंद में डूबे रहें. यहां पहली बार पूरी तरह से वास्तविक प्रयोग हो रहा है. सेक्स को भी सम्मान के साथ अपनाया गया है. यह हमारी विरासत है. हम इसी की पैदाइश हैं. यह हमारे हरेक फाइबर और हर कोशिकाओं में है. इसकी निंदा करने के लिए अपने आप की निंदा करनी होगी. इसे त्यागने का अर्थ केवल अनिच्छा से इसका दमन करना है. और इससे चीजें और अधिक विक़ृत और जटिल हो जाती हैं. अचेतावस्था एक तहखाने की तरह है जहां आप वह सारी चीजें फेंक आते हैं जो आप दुनिया को नहीं दिखाना चाहते हैं. लेकिन अचेतावस्था में आप जो भी चीजे फेंकते हैं, वह एक समस्या को जन्म देती है. आप अपनी ही अचेतावस्था से डरना शुरु कर देते हैं. अगर आप उन सबका दमन करते हैं जो आपको कुरूप बतायी गयी है तो आपके चिंतनशील बनने की कोई संभावना नहीं है. आपके प्रबुद्ध होने की भी कोई संभावना नहीं है.
यह भी गुजर जाएगा
सेक्स को कभी भी दमित नहीं किया जाना चाहिए. सेक्स की समग्रता और उसके आनंद के साथ जीना चहिए और वो भी बिना किसी अपराधबोध के. और तब जो तुम कह रहे हो और जो ये संन्यासी कहते आ रहें हैं, एक दिन आयेगा जब तुम इसके आनंद में खोये होगे लेकिन अचानक से इसकी लालसा खत्म हो जायेगी.

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