देवी द्वारा महिषासुर का संंहार : इसके क्‍या मायने हैं?

नवरात्रि पूरे देश में उत्साह व उमंग से मनाया जा रही है। इस अवसर पर देवी की पूजा होती है। देवी के साथ एक राक्षस महिषासुर दर्शाया जाता है जिसका आधा हिस्सा भैंसे का होता है। इस लेख में सद्‌गुरु बता रहे हैं महिषासुर के प्रतीक के बारे में

नवरात्रि : हर अमावस्या के बाद के 9 दिन
इस संस्कृति में मानव तंत्र का और पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य और चैतन्य के अलग-अलग आयामों के साथ उसके संबंधों का गहन अध्ययन किया गया और उस अध्ययन की बुनियाद पर इस संस्कृति को खड़ा किया गया। ये चीजें हमारे पर्व व त्यौहारों को मनाने के तरीकों, और त्योहारों की तारीखों में भी साफ दिखतीं हैं।
देवी – जो प्रकृति के नारीसुलभ स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं, हमलोग अभी उनसे जुड़े त्याहोर को मनाने जा रहे हैं। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है- नौ रातें। इन नौ रातों की गिनती अमावस्या के ठीक अगले दिन से शुरू होती है। चंद्र कैलेंडर के पहले नौ दिन स्त्रैण प्रकृति के माने जाते हैं।

नौवें दिन को नवमी के तौर पर मनाया जाता है। पूर्णिमा के समय का डेढ़ दिन निष्पक्ष माना जाता है। बचे हुए अठ्ठारह दिन प्रकृतिगत रूप से पुरुष प्रकृति के माने जाते हैं। महीने का यह स्त्रैण पक्ष देवी से जुड़ा होता है। इसलिए परंपरागत तौर पर नवमी तक की सारी पूजा-अर्चना देवी को समर्पित होती है।

वर्तमान नवरात्रि देवी शारदा को समर्पित है
इस तरह पूरे साल में बारह नवरात्रियां आती हैं जो देवी के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित होती हैं। वर्तमान नवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह ज्ञान की देवी शारदा को समर्पित होती है।
इस परंपरा में ज्ञान और सीखने पर खासा जोर दिया जाता है। दूसरे जीव हमसे तेज भाग सकते हैं, वे हमसे ज्यादा ताकतवर होते हैं, वे ऐसा बहुत कुछ कर सकते हैं, जो हम नहीं कर सकते। लेकिन वे हमारी तरह सीख नहीं सकते। इंसान होने का गर्व यही है कि अगर आप इच्छुक हैं तो आप जो चाहें, वह सीख सकते हैं। इसलिए इस नवरात्रि की तैयारी कुछ नया सीख कर करें।

विकास की प्रक्रिया : हर जीव के गुण हैं मनुष्य में
इसके अलावा, एक और पहलू जो हमें दूसरे जीवों से अलग करता है, उसे देवी द्वारा महिषासुर संहार में बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया है। महिषासुर, जिसे पारपंरिक तौर पर आधे इंसान व आधे भैंसे के रूप दिखाया जाता है, वह इंसान की पाशविक प्रकृति का प्रतीक है।
विकास की इस प्रकिया में अमीबा, केंचुआ, टिड्डा, भैंसा और जितने तरह के जीवों का सफर करके इंसान आज इस मुकाम पर पहुँचा है, उन सबकी खूबियां या गुण आज भी उसके भीतर मौजूद हैं। ये सारी बाध्यकारी प्रवृत्तियां हैं। यहां तक कि आधुनिक तंत्रिका विज्ञान भी मानता है कि आप के मस्तिष्क का एक भाग सरीसृप यानी रेंगने वाले जीवों की तरह का है। इस विकास-प्रक्रिया में यह सरीसृप जैसा मस्तिष्क, विकास के उस चरण को दर्शाता है, जो आज भी प्रवृत्ति के रूप में हमारे भीतर प्रभावकारी है।
इंसान ने जब सीधे चलना शुरू किया और इंसान की रीढ़ की हड्डी जब ऊपर की ओर उठी तो सरीसृप के दिमाग के ऊपर सेरेब्रल कोर्टेक्स का निर्माण हुआ। यही चीज आपको इंसान बनाती है। यही चीज आपको इस अस्तित्व की सार्वभौमिकता के बारे में सोचने और यह सोचने लायक बनाती है कि इस सृष्टि में सब कुछ एक ही है।
यही चीज आपको एक वैज्ञानिक या आध्यात्मिक जिज्ञासु बनाती है। लेकिन अगर हम अपने रेंगने वाले दिमाग की ओर वापस जाएं तो हमारे भीतर सिर्फ अपने को जिंदा रखने और अपने अस्तित्व की रक्षा करने की प्रवृत्ति रहेगी। इंसान के शिक्षित होने, आध्यात्मिक प्रक्रिया और ध्यान आदि की कोशिशें उसे सरीसृप वाले मस्तिष्क से सेलेब्रल कोर्टेक्स वाले मस्तिष्क की ओर ले जाती हैं, जो आपको जीवन में और ज्यादा समग्रता वाली सोच देता है। अगर आप अपने रेंगने वाले दिमाग से काम करेंगे तो फिर आप अपने चारों ओर सीमाएं ही बनाते रह जाएंगे।

सहस्रार का फूल खिलना चाहिए
जब भी आपको अपने आसपास के लोगों से समस्याएं होती हैं, तो उसका बुनियादी कारण होता है – आपके और उनके बीच की चारदीवारी। ‘क्या आपका है’ और ‘क्या उनका है’, इसका अंतर ही दो लोगों के बीच बुनियादी समस्या पैदा करता है। अगर आप अपने दिमाग के सिर्फ एक पहलू का इस्तेमाल करेंगे तो आप अपना काम तो चला लेंगे, लेकिन आप अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
योगिक सिस्टम में ऐसे तरीके भी हैं, जिनके जरिए इंसान का रेंगने वाला दिमाग खोला जा सकता है, जिससे दिमाग का यह हिस्सा सेरेब्रल कोर्टेक्स से संवाद स्थापित करना शुरू कर देता है और फिर दोनों हिस्से एक दिमाग की ही तरह से काम करने लगते हैं। ऐसे कई अध्ययन हुए हैं, जिनसे सामने आया है कि कुछ खास तरह की ध्यान प्रक्रियाओं के जरिए इस स्थिति को पाया जा सकता है। सेरेब्रल कोर्टेक्स का फूल खिलना ही चाहिए। इसीलिए इस योगिक संस्कृति में मानव सिस्टम में मौजूद चक्रों को कमल के फूल के रूप में दर्शाया जाता है, जिसमें सबसे बड़ा फूल सहस्रार का प्रतीक होता है, जो हमारी सिर में शीर्ष पर होता है।

सेरेब्रल फूल के खिलने पर एकत्व जागृत होगा
अगर सेरेब्रल फूल खिलना शुरू होता है तो मानव बुद्धि एकीकृत होकर और सबको समाहित करते हुए काम करना शुरू कर देती है। सबको समाहित करने की सोच कोई दर्शन नहीं है। यह तो अस्तित्व का स्वभाव है। दुनिया का कोई और प्राणी यह महसूस नहीं कर सकता। वे सब अपनी सीमाओं को तय करने में जुटे हैं।
एक कुत्ता चारों तरफ इसलिए नहीं पेशाब करता, क्योंकि उसको मू़त्र की कोई समस्या होती है, दरअसल वह अपने इलाके की सीमा तय करने के लिए ऐसा करता है। इंसान भी यही चीज कई दूसरे रूपों और तरीकों से कर रहा है। वे लोग भी अपनी सीमाएं तय करने में व्यस्त हैं और अगर संभव हो तो सीमाओं को धक्का देकर थोड़ा और बढ़ाने में जुटे हैं। देवी द्वारा महिषासुर का संहार इंसान में पाशविकता को खत्म करने का प्रतीक है। इसका मतलब है कि अब आप बड़ा फूल हो गए हैं। आपके सामने यह विकल्प है कि आप खुद अपना सरीसृप वाला दिमाग खोल लें या फिर दैवीय शक्ति आपको परास्त कर देगी।

स्त्री प्रकृति के आगे पशु प्रवृत्ति झुक गई
इस प्रतीक का एक और पहलू है कि पौरूष प्रकृति, अकेले होने पर, सिर्फ प्रवृत्तियों के द्वारा संचालित होती है। इसका मतलब है कि रेंगने वाला दिमाग एक बंद मुठ्ठी की तरह है, जब नारीसुलभ तत्व आता है तो यह खुल सकता है। जब यह खुलता है तो उसमें मौजूद जो पुरुषैण या पाशविक तत्व होता है, उसे नारी तत्व या देवी के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। देवी और महिषासुर का प्रतीक बस यही दर्शाता है – कि देवी अपनी पूरी शक्ति के साथ उठ खड़ी हुईं, और उनके सामने पशु प्रकृति को घुटने टेकने पड़े।

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