अध्‍यात्‍म में 108 की संख्‍या महत्‍वपूर्ण है, क्‍यों?

सृष्टि से पहले एक विशाल शून्य की अवस्था थी। इसी अवस्था से रचना की तीन संभावनाएं उभरीं। इस शून्यता ने असीम आकाश से समय, ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण के रूप में व्यक्त होने का फैसला किया। इन तीन मूलभूत तत्वों ने उस आकाश को जो समय और सीमा से परे था, एक समय से बंधी, सीमित सृष्टि में बदल दिया। इन तीनों में जो समय है – निर्मम समय –वह प्रफुल्लित भी करता है और कुचलता भी है, बढ़ावा भी देता है और पीसता भी है, उठता है और गिरता है। समय किसी को नहीं बख्शता। कीड़ा हो या पक्षी, शिकार या शिकारी, शासित या शासक, दास या सम्राट, सुंदर शरीर और अद्भुत महल, सम्मान हो या अपमान – सब कुछ वापस शून्य में चला जाता है, धूल और राख बन जाता है।काल यानि समय का चक्र निर्ममता से चलता रहता है। या तो आप इस काल पर सवार होकर एक खूबसूरत जिंदगी जीते हैं, या समय के निर्दयी पहिये के नीचे कुचल दिए जाते हैं। समय की प्रक्रिया से हम या तो नष्ट हो जाते हैं या उसका लाभ उठा कर मुक्त हो जाते हैं।

कोई इसकी प्रक्रिया के फंदे में फंस जाता है तो कोई इसका इस्तेमाल करके खुद को परे ले जाता है और मुक्त हो जाता है।समय सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण आयाम है। यह सिर्फ इंसानी कल्पना या मानव ज्ञान की उपज नहीं है, जैसा कि ज्यादातर लोग मानते हैं। अगर समय न होता तो न तो कोई शुरुआत होती और न अंत होता। अगर कोई शुरुआत और अंत न होता, तो सृष्टि ही नहीं होती।हमारा अस्तित्व समय में ही है। हम समय में ही जन्मे थे और समय में ही मरेंगे। अगर हम समय का महत्व, उसके नियम, उसका धर्म समझ लें और समय के धर्म के साथ तालमेल बिठा लें, तो हम सिर्फ जय नहीं, विजय होंगे। हम यहां भी कामयाब होंगें और परे के आयाम में भी कामयाब होंगे। इसके उल्टा, जो समय के धर्म के साथ तालमेल में नहीं चलता, वह समय की प्रक्रिया से कुचला जाता है और चूर-चूर हो जाता है। जीवन बस समय का एक खेल है। इसे समझते हुए हमारे यहां के प्राचीन ऋषि-मुनियों और योगियों ने समय पर बहुत ध्यान दिया। समय की हमारी पहचान मुख्य रूप से अपने आस-पास की सृष्टि – पृथ्वी और सौरमंडल से हमारे जुड़ाव पर आधारित है। एक प्राचीन भारतीय खगोलग्रंथ, सूर्य सिद्धांत के अनुसार, सूर्य की रोशनी 0.5 निमिष में 2,202 योजन की दूरी तय करती है। एक योजन नौ मील के बराबर होता है। 2,202 योजन का मतलब है, 19,818 मील। एक निमिष एक सेकेंड के 16/75 के बराबर होता है। आधा निमिष एक सेकेंड का 8/75 वां हिस्सा है, जिसका अर्थ है 0.106666 सेकेंड। 0.106666 सेकेंड में 19,818 मील की गति का मतलब है, 185,793 मील प्रति सेकेंड। यह आधुनिक गणना के आस-पास ही है, जिसके मुताबिक प्रकाश की गति 186,282 मील प्रति सेकेंड है। आधुनिक विज्ञान बहुत मुश्किल से और तमाम तरह के उपकरणों की मदद से इस संख्या पर पहुंचा है। जबकि कुछ हजार साल पहले, लोगों ने बस यह देखकर इस संख्या का पता लगा लिया था कि इंसानी प्रणाली और सौर प्रणाली एक साथ कैसे काम करते हैं।सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी, चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी, यह ग्रह जिस तरह घूमता है और उसका जो असर पड़ता है, इन सभी चीजों पर बहुत ध्यान दिया गया था। सूर्य के व्यास (डायमीटर) का 108 गुना, सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी के बराबर है। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी चंद्रमा के व्यास का 108 गुना है। सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का 108 गुना है। इसी वजह से माला में 108 मनके होते हैं।मैं तमाम शानदार संख्याएं बता सकता हूं, मगर सबसे महत्वपूर्ण चीज है, समय और इंसानी शरीर की रचना में गहरा संबंध। आप जानते हैं कि पृथ्वी लगभग गोल है और उसका कक्ष यानी ऑर्बिट थोड़ा सा झुका हुआ है। चलते हुए और घूमते हुए, वह एक वृत्त बनाती है। आज हम जानते हैं कि इस चक्र को पूरा करने में 25,920 साल लगते हैं। यह झुकाव मुख्य रूप से धरती की ओर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण होता है। इतने सालों का एक युग-चक्र होता है। हर चक्र में आठ युग होते हैं।अक्षीय गति के एक चक्र पर वापस जाएं तो 25,920 को 60 (जो एक स्वस्थ व्यक्ति की प्रति मिनट हृदय गति भी है) से भाग करने पर 432 आता है। चार सौ बत्तीस संख्या बहुत सी संस्कृतियों में अहम है – प्राचीन यहूदी संस्कृति, मिस्र की संस्कृति, मेसोपोटामिया की संस्कृति और भारतीय संस्कृति में भी। 432 क्यों? अगर आपकी सेहत और अवस्था अच्छी है, तो आपका हृदय प्रति मिनट 60 बार धड़कता है, जिसका मतलब है, एक घंटे में 3600 बार। इसे 24 से गुना करने पर एक दिन में आपका दिल 86,400 बार धड़कता है। 864 को 2 से भाग करने पर, फिर से 432 आता है।जब आप समय की सवारी करते हैं, उसका लाभ उठाते हैं, तो आप एक असाधारण जीवन जी सकते हैं, इंसान और इंसानी दिमाग को असाधारण जीवन के लिए ही तैयार किया गया है।अगर आप स्वस्थ हैं, तो आप प्रति मिनट लगभग 15 बार सांस लेते हैं। अगर आपने खूब साधना की है, तो यह संख्या 12 हो सकती है। प्रति मिनट 15 सांस का मतलब है, 900 सांस प्रति घंटा और 21,600 प्रति दिन। 216 को 2 से गुना करने पर फिर से 432 आता है। अगर आप पृथ्वी का घेरा लें – तो एक इकाई होती है – समुद्री मील- असल अर्थ में मील यही है क्योंकि यह पृथ्वी पर असर डालती है। माप की दूसरी इकाइयां गणना की आसानी के लिए बनाई गई थीं।आपको पता है कि एक वृत्त में 360 डिग्री होते हैं। इसी तरह, पृथ्वी के ऊपर 360 डिग्री हैं और हर डिग्री को 60 मिनट में बांटा गया है। इनमें से एक मिनट एक समुद्री मील के बराबर है। इसका मतलब है कि विषुवत रेखा पर पृथ्वी का घेरा 21,600 समुद्री मील है, इतनी ही सांसें आप दिन भर में लेते हैं। इसका मतलब है कि पृथ्वी समय पर घूम रही है और आप सही सलामत हैं। अगर पृथ्वी समय पर नहीं घूमती, तो यह हम सब के लिए अच्छा नहीं होता। अगर आप उसके साथ तालमेल में नहीं हैं, तो यह भी आपके लिए अच्छा नहीं है।

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