आध्यात्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा जरूरी by chanakya

सज्जन कौन होता है? इस प्रश्न का उत्तर अनेक लोग अनेक प्रकार से देते हैं। कुछ लोग सज्जनता की कसौटी आचार की निर्मलता को बनाते हैं। कुछ लोग उदार विचारों में सज्जनता का दर्शन करते हैं, व्यवहार कुशल व्यक्ति को भी सज्जन माना जाता है। एक मत के अनुसार सज्जन वह होता है, जो समाज सेवा और सहयोग के लिए सदा तत्पर रहता है। भारत ऐसा देश है, जहां आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा है। यहां व्यक्ति का अंकन उसके चरित्र के आधार पर किया जाता है। यहां कितने अच्छे- अच्छे व्यक्ति हुए हैं। सिर्फ आगे बढ़कर बोलने वाले ही नहीं, अच्छा आचरण करने वाले भी हुए हैं। यहां गणतंत्र बाद में आया, उसके पहले ऐसे व्यक्ति सामने आ गए, जिन्होंने गणतांत्रिक मूल्यों को जीवन का आदर्श बनाया। पूर्वजों की उस थाती की सुरक्षा करना हर व्यक्ति का काम है। मनुष्य के सामने दो दृष्टिकोण हैं। एक दृष्टिकोण है काम पूरा करने की। दूसरा दृष्टिकोण है कठिनाई देखने की। यह कठिनाई है, वह कठिनाई है -इस प्रकार देखने वाला या सोचने वाला कोई काम नहीं कर सकता। कौन-सा काम ऐसा है जिसे संपादित करने में कठिनाई न हो? एक घुड़सवार अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए कुएं पर ले गया। वहां अरहट से पानी निकलता था। कुएं वाले ने पानी निकालना शुरू किया, पर अरहट की खटखट सुन घोड़ा चमकने लगा। घुड़सवार बोला, अरे भाई! मेरा घोड़ा चमक रहा है। तुम यह खटखट बंद करो। खटखट बंद हुई, तो पानी भी बंद हो गया। घुड़सवार फिर बोला, पानी बंद क्यों किया? कुएं वाला बोला, ‘यह अरहट वाला कुआं है। यहां खटखट होगी, तभी पानी आएगा। यह दुनिया भी अरहट वाले कुएं जैसी है। यहां कुछ न कुछ खटखट होती रहती है। मनुष्य उसे देखने लगे तो सुख से जी नहीं सकता। दुनिया में खटखट होती रहे और मनुष्य शांति से जीवन चलाता रहे। इसी तरह वह अपने जीवन को आनंदमय बना सकता है। एक बार मगध में अकाल पड़ा। लोगों के सामने बड़ी समस्या पैदा हो गई , अब क्या करें , कहां जाएं ? चाणक्य एक साधारण – सी झोंपड़ी में रहते थे। उन्होंने घोषणा करवाई , लोगों के पास गरम कपड़े नहीं हैं। सामने सर्दी का मौसम है। उनको सर्दी से बचाना है। जिनसे हो सके वे सब लोग अपने – अपने घरों से कंबल लाकर दो। घोषणा की देरी थी कि चाणक्य के झोंपड़े में कं बलों का ढेर लग गया। चाणक्य अपने झोंपड़े में बैठे थे। सामने नए कंबलों का ढेर लगा था। पर चाणक्य ने एक फटा – पुराना सा ही कंबल ओढ़ रखा था। रात के समय वहां कोई चोर घुसा। नए और अच्छे कंबलों की बात सुन उसका मन ललचा गया। चोर झोंपड़े में छिपकर खड़ा था और चाणक्य के सोने की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी कोई विदेशी व्यक्ति चाणक्य से मिलने आया। चाणक्य को फटे – पुराने कंबल में लिपटे देख उसने पूछा , महामात्य ! आपके सामने अच्छे – अच्छे कंबलों का ढेर लगा है , फि र आपने यह जीर्ण – शीर्ण कंबल क्यों ओढ़ रखा है ? चाणक्य बोले , आप जिन कंबलों की ओर संकेत कर रहे हैं , वे सब जनता के हैं। जनता की चीज जनता के ही काम आएगी। ये मेरे लिए नहीं हैं। विदेशी यह बात सुन आश्चर्यचकित रह गया। लेकिन चोर को भी ऐसा सबक मिला कि उसने चोरी करनी छोड़ दी। प्रशासन में जिन लोगों को काम करने का अवसर मिलता है , वे चाणक्य के जीवन से प्रेरणा लें तो गणतंत्र सफल बन सकता है। अन्यथा गणतंत्र के गीत गाते रहें और उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहें , तो इससे देश की नीतियों में बदलाव कैसे आएगा ? जनता की चारित्रिक शुचिता बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि पहले नेतृत्व देने वालों का चरित्र उज्वल रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *