नेता की सज्जनता का पैमाना कैसा होगा

सज्जन कौन होता है? इस प्रश्न का उत्तर अनेक लोग अनेक प्रकार से देते हैं। कुछ लोग सज्जनता की कसौटी आचार की निर्मलता को बनाते हैं। कुछ लोग उदार विचारों में सज्जनता का दर्शन करते हैं। व्यवहार कुशल व्यक्ति को भी सज्जन माना जाता है। एक मत के अनुसार सज्जन वह है, जो हमेशा समाज सेवा और सहयोग के लिए तत्पर रहता है। पंखा स्वयं घूमता है और दूसरों के ताप को दूर करता है। इसी प्रकार सज्जन व्यक्ति भी गांव-गांव घूम कर जनता के संताप का निवारण करते हैं। एक घुड़सवार अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए कुएं पर ले गया। वहां रहट से पानी निकलता था। रहट चलाने वाले व्यक्ति ने पानी निकालना शुरू किया, लेकिन उसकी खड़खड़ सुन कर घोड़ा चमकने लगा। घुड़सवार बोला, ‘अरे भाई! घोड़ा चमक रहा है। तुम यह खड़खड़ बंद करो।’ रहट वाले ने रहट चलाना बंद कर दिया। पर खड़खड़ बंद हुई, तो पानी भी बंद हो गया। घुड़सवार फिर बोला, पानी क्यों बंद कर दिया? रहट वाले ने समझाया, यह रहट वाला कुआं है। यहां खड़खड़ होगी, तभी पानी आएगा। यह दुनिया भी रहट वाले कुएं जैसी है। यहां कुछ न कुछ खटखट होती रहती है। मनुष्य उसे देखने लगे तो सुख से जी नहीं सकता। दुनिया में खटखट होती रहे और मनुष्य शांति से अपना जीवन चलाता रहे। इसी तरह से वह अपने जीवन को आनंदमय बना सकता है। एक बार मगध जनपद में अकाल पड़ा। दिहाड़ी वाले लोगों के सामने बड़ी समस्या पैदा हो गई। उनके पास न खाने के लिए रोटी थी और न पहनने के लिए कपड़ा। क्या करें, कहां जाएं? अकालग्रस्त लोगों को राहत पहुंचाने का अभियान प्रारंभ किया गया। चाणक्य एक साधारण-सी झोंपड़ी में रहते थे। उन्होंने घोषणा करवाई, अकाल से प्रभावित लोगों के पास कपड़े नहीं हैं। आगे बरसात का मौसम है। उनको सर्दी से बचाना है। सब लोग अपने-अपने कपड़े ला कर दो। घोषणा की देरी थी, महामात्य के झोंपड़े में कपड़ों का ढेर लग गया। चाणक्य अपने झोंपड़े में लेटे थे और सामने नए-पुराने कपड़ों का ढेर लगा था। लेकिन चाणक्य की अपनी चारपाई पर कोई बिस्तर नहीं था। रात के समय वहां कोई चोर घुसा। नए-नए कपड़े देख कर उसका मन ललचा गया। वह झोंपड़े में छिपकर खड़ा था और चाणक्य के सोने की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी एक नगर श्रेष्ठि चाणक्य से मिलने आ पहुंचा। चाणक्य को बिना चादर-बिस्तर के लेटे देख कर उसने पूछा, ‘महामात्य! आपके सामने अच्छे-अच्छे बिस्तरों का ढेर लगा है, फिर आप इस तरह क्यों लेटे हैं? चाणक्य ने कहा, ये सब जनता के हैं। जनता की चीज जनता के ही काम आएगी। ये मेरे लिए नहीं हैं। आगंतुक यह सुन कर आवाक रह गया। और चोर को तो बात ऐसी चुभी कि उसने चोरी करनी ही छोड़ दी। देश के नेता वर्ग से एक प्रश्न है। वह चाणक्य के जीवन से शिक्षा कब लेगा? प्रशासन में जिन लोगों को काम करने का अवसर मिलता है, वे चाणक्य के जीवन से प्रेरणा लें तो गणतंत्र सफल बन सकता है। सिर्फ राष्ट्रभक्ति और डेमोक्रेसी के गीत गाते रहें और इसी ढर्रे पर चलते रहें, तो देश की नीतियों में बदलाव कैसे आएगा? मंत्रिमंडल में जो लोग आते हैं, उनका यह नैतिक दायित्व है कि वे अपने इस्पाती चरित्र से देश को नई दिशा दें। जनता की चारित्रिक शुचिता बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि नेतृत्व का चरित्र उज्जवल रहे। चरित्र की उज्जवलता का मानदंड क्या है? उपर हमने इसी की चर्चा की है। हमारा व्यवहार, हमारी सोच। मनुष्य के सामने दो दृष्टिकोण हैं। एक दृष्टिकोण है- कठिनाई देखने का। यह कठिनाई, वह कठिनाई- इस प्रकार देखने वाला या सोचने वाला कोई काम नहीं कर सकता। कौन-सा काम ऐसा है जिसे संपादित करने में कठिनाई न हो?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *