पुरुषार्थ से ही पूरी होती हैं कामनाएं

अथर्ववेद में कहा गया है: ‘ कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहित: ‘ यानी यदि पुरुषार्थ मेरे दाएं हाथ में है तो सफलता मेरे बाएं हाथ का खेल है। जो कठिन परिश्रम करते हैं , ईश्वर उन्हीं का सच्चा साथी है। वेद , कुरान , गीता या बाइबल पढ़ना उन्हीं का सार्थक है , जो आलस्य से दूर हैं। आलस्य करना वेदों में पाप माना गया है। ऐतरेय ब्राह्माण में कहा गया है कि जो पूरी शक्ति से परिश्रम नहीं करते , उन्हें लक्ष्मी(धन) नहीं मिलती। परिश्रम करने वाले आदमी को सफलता कदम-दर- कदम मिलती है। ऐसा आदमी आत्मप्रतिभा संपन्न होता है। जो व्यक्ति बिना श्रम किए सब कुछ पाना चाहता है , उसकी आत्मा में रोशनी नहीं आ सकती। यह लोक कहावत है कि बैठने वालों का भाग्य बैठ जाता है , और जो खड़ा हो जाता है उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है। जो सो जाते हैं , उनका भाग्य भी सो जाता है। और जो चलने लगते हैं , उनका भाग्य भी चलने लगता है। आपने ध्यान दिया होगा कि पुराने व्यापारी गद्दी पर ऊँघने को अशुभ मानते हैं। वेद शास्त्रों में जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं। ये हैं धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष। सृष्टि के नियमों के मुताबिक चलना धर्म है। परिश्रम एवं सचाई से श्रम कर धन कमाना अर्थ है। कार्य में लगातार लगे रहना , ऊर्जा का संचय करना तथा पितृऋण से मुक्ति पाने के लिए संतान पैदा करना काम है। दुखों से छुटकारा , आवागमन से मुक्ति तथा अनंत काल तक ईश्वर के आनंद में घूमते रहना मोक्ष कहलाता है। ये चारों ही पुरुषार्थों के लिए श्रम करना होता है। उन्हें पाने का वही एक रास्ता है। जो लोग कलियुग का बहाना करके बैठे रहते हैं , उन्हें सफलता कभी नहीं मिल सकती। इसीलिए कहा गया है , कि सोने वालों के लिए सदा ही कलियुग है। जिस व्यक्ति ने परिश्रम करने का विचार कर लिया , उसके लिए द्वापर शुरू हो गया और जिस आदमी ने श्रम के लिए कमर कस ली , उसके लिए त्रेता का आरंभ हो गया। जिसने काम शुरू कर दिया , उसके लिए उसी क्षण सतयुग आ गया। भारत में करोड़ों लोग ‘ कलियुग ‘ का बहाना कर ‘ भाग्य ‘ का नाम लेकर बैठे ऊंघते रहते हैं। कहते हैं कलियुग है , इस युग में पापी फलते हैं और धर्मात्मा दु:ख पाते हैं। यह कुतर्क है। अमेरिका , जापान और जर्मनी में भी लोग रहते हैं। क्या उन पर कलियुग का असर नहीं पड़ता ? मतलब साफ है कि कठिन श्रम और ईमानदारी से कार्य करने वाले के लिए कलियुग भी सतयुग के समान है। और उद्यम नहीं करने वाले तथा दूसरों में दोष देखने वालों के लिए सतयुग भी सदा कलियुग ही बना रहता है। ईश्वर उसी की मदद करता है , जो अपनी मदद खुद करता है। इसके लिए चाहिए आत्मविश्वास , लगन , धैर्य , संतोष , साहस और कर्म। इन मूल्यों को जो अपना लेता है , उसे न निराशा हाथ लगती है और न कभी हंसी का पात्र ही बनना पड़ता है। श्रम करते समय हमें अपनी सफलता पर विश्वास करना चाहिए , परंतु दूसरे के हित का नुकसान भी न हो- इसका भी हमें ध्यान होना चाहिए। जो इस बात का ध्यान करना है , वही सच्चे अर्थों में कर्मवादी है। पुराणों और शास्त्रों के नजरिए से देखें तो कर्म तीन तरह के होते हैं- क्रियामाण , संचित और प्रारब्ध। जो काम किया जा रहा है वह क्रियामाण है। किए कर्म का संचित फल संचित कर्म कहलाता है। क्रियामाण और संचित कर्म जब फल देने की स्थिति में आ जाएं , तो उसे प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। इस तरह , इन तीन तरह के कर्मों के बारे में जानते हुए हमें श्रम और उद्देश्य का निर्धारण करना चाहिए। काफी लोग कर्म ( कार्य) में ग्रह-नक्षत्र को बाधक मानते हैं। महापंडित चाणक्य ने ऐसे लोगों को बालक कहा है। चाणक्य कहते हैं , ‘ काम के वक्त नक्षत्र और मुहूर्त पूछने वाले बालक हैं , ऐसे अबोध लोगों को सफलता कभी नहीं मिलती। इसलिए कठिन श्रम से हमेशा हमें ओतप्रोत रहना चाहिए। मनुष्यता के लिए यही सच्चा रास्ता है।

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