ईश्वर प्रणिधान – ईश्वर के लिए भक्ति कैसे हो सकती है, प्रेम कैसे उमड़ सकता है?

ईश्वर को अपने आप से अलग देखना पहला कदम है। समर्पण के लिए भी दो की आवश्यकता होती है, भगवान और भक्त। यह मानो कि ईश्वर ही सब कुछ है और तुम कुछ भी नहीं हो।

ईश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वोपरि है और मैं कुछ भी नहीं हूँ। इस कुछ नहीं होने के भाव से ही एक हो सकते हैं। तब यह अनुभूति होती है कि सब कुछ तुम ही हो, जो भी सब मैं हूँ, वह भी तुम ही हो।

यह शरीर और पूरा ब्रह्माण्ड आपका ही है। यह मन भी आपका ही है। यह मन और इसके सारे द्वन्द भी आपके ही हैं। यह मन और इसकी सुंदरता भी आपकी ही है। इस तरह का समर्पण भी एक प्रक्रिया है जो तुम्हें पुनः स्वयं में स्थापित कर सकती है। ईश्वर प्रणिधान ध्यान में तुम्हें आनंद से भर देता है और समाधि की अवस्था में ले आता है।

दीप-धूप, फल-फूल अर्पण करने में कुछ विशेष नहीं, अपने शरीर के एक एक अंग का अर्पण करो। जीवन के प्रत्येक क्षण का अर्पण करो। हर श्वांस, हर विचार, अच्छा बुरा, जैसा भी, सब कुछ अर्पण कर दो। अपनी सभी वासनाओं, दुर्गुणों और जो भी तुम अपने आप में बुरा समझते हो, उस सब को भी अर्पण कर दो। जो भी तुम्हारे में नकारात्मक है और जो भी सकारात्मक है, उस सभी को अर्पित कर दो। नकारात्मक को अर्पण कर देने से तुम मुक्त हो जाओगे और सकारात्मक को अर्पण कर देने से तुम्हें अहंकार नहीं होगा। तुम्हारे गुण तुम्हें अभिमानी बना सकते हैं। गुणों से तुम्हें ऐसे लग सकता है जैसे तुम कुछ विशेष हो। अवगुण अथवा तुम्हारी कमियां तुम्हें नीचे धकेलती हैं और तुम्हें अपने बारे में बुरा लगता है।यदि तुम्हें अपने बारे में बुरा लगने लगे, ईश्वर से सामीप्य न लगे, तब कुछ भी ऐसा नहीं है जो तुम्हें उस जुड़ाव को महसूस करवा सके।

यह केवल तुम्हारे ऊपर ही है कि तुम ईश्वर से सामीप्य महसूस करते हो। वैसे ये तुम्हारे ऊपर ही है कि तुम अपने आप को किसी के भी कितना घनिष्ठ मानते हो। यदि किसी दूसरे व्यक्ति को घनिष्ठता न भी लगे फिर भी तुम्हें अपनी ओर से निकटता महसूस करनी चाहिए। इस बात के कोई मायने नहीं कि वो तुमसे घनिष्ठता महसूस करते है कि नहीं। तुम यह पता भी कैसे कर सकते हो, केवल उनके व्यवहार से?  नहीं, व्यवहार सही तरीका नहीं है।

तुम्हारे स्वयं के मन के अलावा और कुछ ऐसा है ही नहीं, जिससे तुम्हें यह यह यकीन हो जाए कि तुम ईश्वर के प्रिय हो। दूसरे लोगों से तुलना करना बंद करो। ऐसे ही गुरु के साथ है। तुम्हें लग सकता है कि फलां फलां गुरूजी के बड़े निकट हैं क्योंकि गुरूजी उनसे बार बार मुस्कुरा के बात करते हैं और मुझसे तो बात ही नहीं करते हैं। यह सब तुम्हारा भ्रम है। बात करने, न करने से कुछ अंतर नहीं होता।  तुम ऐसे महसूस करने लगो की तुम ही गुरु के निकटतम हो, तुम ही हो बस। और फिर वैसा ही होना लगेगा, जैसे तुम बीज डालोगे, वैसा ही घटने लगेगा।

यदि तुम यही सोचते रहोगे कि मैं बेकार हूँ, कुछ काम का नहीं हूँ, ऐसे बीज डालोगे तो कहाँ से कुछ अच्छा होगा।

अधिकतर बेकार खरपतवार अपने आप उग आती है, उसे उगाने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता, परन्तु उपयोगी पौधों को उगाने के लिए उन्हें पोषित करना पड़ता है। तुम्हारे मन के पटल पर भी, प्रतिदिन तरह तरह के बेकार विचार, संशय, भाव उठते रहते हैं। उनको तुम्हें बोने की भी कोई आवश्यकता नहीं होती, वो अपने आप ही आ जाते हैं। स्वाध्याय और जागरूकता से तुम इन सबको उखाड़ फेंक सकते हो और केवल जरूरी को संभाल कर रख सकते हो।

तपसः, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान – यही क्रिया योग है। यह सब करते हुए भी ऐसा भाव रखो कि तुम यह नहीं कर रहे हो, शांत साक्षी बनो। बाहर की प्रक्रियाओं के बावजूद तुम अपने भीतर इस सबसे अछूते हो।

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