परमात्मा आता है सौंदर्य बन कर

मेरे देखे प्रत्येक व्यक्ति को कई बार जीवन में परमात्मा की झलक मिलती है। तुम कहोगे कि नहीं, हमें तो नहीं मिली। फिर भी मैं कहता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को मिलती है। कई बार मिलती है। तुम्हारी यह धारणा कि तुम्हारे प्रयास से ही झलक मिलती है, बिल्कुल गलत है। कई बार अनायास मिलती है, आकस्मिक मिलती है।
कभी-कभी परमात्मा प्रसाद-स्वरूप आता है, क्योंकि तुम्हीं थोड़े ही उसे खोज रहे हो; वह भी तुम्हें खोज रहा है। कभी-कभी वह सफल हो जाता है तुम्हें खोजने में। कभी-कभी तुम सफल नहीं हो पाते हो,उससे भागने में। कभी-कभी अनजाने किसी क्षण में तुम्हें वह आविष्ट कर लेता है, तुम्हें घेर लेता है। तुम्हारे बावजूद कभी-कभी तुम्हें उसका स्वाद आ जाता है। लेकिन उस स्वाद का तुम्हारे भीतर कोई स्मरण नहीं बनता, क्योंकि तुम्हारे भीतर जो तर्कजाल फैला है, शब्द जाल है, सिद्धांत, शास्त्र हैं, उसमें कहीं भी उसकी कोई व्यवस्था नहीं जुट पाती, उसके साथ कोई तालमेल नहीं बैठ पाता, कोई प्रसंग नहीं जुड़ पाता। वह अलग रह जाता है, टुकड़े की तरह।
तुम्हारी सारी मन की चिंतना में ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे इस नए अनुभव को समझ सको, तो धीरे-धीरे यह विस्मृत हो जाता है। जब होता है, या तो तुम तब ही भरोसा नहीं करते उस पर। तब ही तुम कहते हो कि वह कल्पना कर ली होगी; कोई ऐसे ही ख्याल आ गया कि आज मन प्रसन्न था, इसलिए ऐसा लग गया। तुम कुछ बहाने खोज लेते हो या तुम कुछ व्याख्याएं कर लेते हो।
तुमने सुबह सूरज को उगते देखा किसी दिन- और अचानक कुछ हुआ! सूरज के उगते-उगते तुम्हारे भीतर कुछ उग गया। उधर बाहर रोशनी फैली, इधर भीतर भी रोशनी फैल गई। तुम सोच लेते हो मन में कि यह सुबह के सूरज के सौंदर्य की छाया बनी। तुमने समझा लिया अपने को। तुमने एक व्याख्या कर ली। आया था परमात्मा, तुमने सूरज का सौंदर्य समझ कर समझा-बुझा लिया, बात खत्म हो गई। किसी दिन आकाश में चांद को देख कर, किसी बच्चे की मुस्कराहट में, कभी किसी की आंख से छलकते आंसू में- तुम ठिठक गए हो; एक क्षण को सब रुक गया है और एक क्षण को एक झरोखा आया, एक हवा आई, जो तुम्हें ताजा कर गई; लेकिन तुमने उसकी व्याख्या कर ली। व्याख्या क्षुद्र के साथ कर ली।
जिन्हें भी परमात्मा का अनुभव हुआ है, उन सबको यह भी अनुभव हुआ है कि अनुभव के पहले भी बहुत बार परमात्मा ने कभी-कभी झलक दी थी। रामकृष्ण को ऐसा हुआ। छोटे थे। कोई सात साल या आठ साल की उम्र थी। परमात्मा का तो कोई अनुभव नहीं था। खेत से लौट रहे थे। बीच में एक तालाब पड़ता था। तालाब के किनारे से निकलते वक्त उनके पैरों की आहट सुन कर बगुले बैठे होंगे तालाब के किनारे, वे एकदम से उड़े। कोई दस-पंद्रह बगुलों की सफेद कतार और पीछे एक काला बादल। उस काले बादल में से तीर की तरह उड़ गए सफेद बगुले एक क्षण में, जैसे बिजली कौंध गई। रामकृष्ण वहीं ठिठक गए, कुछ हुआ, बेहोश होकर गिर गए। आस-पास के किसान उन्हें घर उठा कर लाए। किसी को समझ में न आया कि हुआ क्या! रामकृष्ण को भी समझ में नहीं आया। होश में आ गए, बात भूल गई। सबने यही कहा कि कुछ हो गया होगा। किसी ने कहा कि दिन भर का भूखा था, काम करता रहा खेत में, छोटा बच्चा है अभी, थक गया होगा, मूच्र्छा आ गई। जो कुछ ज्यादा होशियार थे, उन्होंने कहा कि रामकृष्ण से पूछना होगा। रामकृष्ण ने कहा कि बगुलों की एक सफेद पंक्ति उड़ती हुई और पृष्ठभूमि में काला बादल, जैसे बिजली कौंध गई, कुछ हुआ मेरे भीतर! मुझे पता नहीं क्या हुआ। मगर अपूर्व आनंद हुआ! उस आनंद में वह गिर पड़ा। लोगों ने कहा कि बच्चा है, अभी इसे क्या पता आनंद का!
रामकृष्ण को तो कोई परमात्मा का अनुभव नहीं था, इसलिए यह कैसे कहें कि परमात्मा का अनुभव हुआ। बात आई-गई हो गई, भूल गई। ऐसा रामकृष्ण को होता रहा कभी-कभी। अर्थ तो पीछे खुला,जब पूरा परमात्मा मिला। अर्थ तो तब खुला। तब रामकृष्ण ने लौट कर देखा कि अरे! यह जो आज बरस रहा है आकाश से, इसी की बूंदें पड़ी थीं। वे बूंदें इसी की थीं। अब अनुभव हुआ। अब स्वाद आया तो पुरानी स्मृतियां भी ताजी हो गईं; तब सब सूत्रबद्ध हो गया। तब रामकृष्ण ने कहा कि उस दिन जो सफेद बगुलों को उड़ते देखा था काले बादल के बीच, वह तू ही उड़ा था। वे बगुले नहीं थे, वह काला बादल नहीं था, तू ही उड़ा था। और मैं जो ठिठक गया था, वह समाधि थी। मगर मैं अपरिचित, अनजान, मैं मूढ़, पहचान न पाया। तूने एक झलक दी थी, पर मैं चूक गया।
तुम भी जिस दिन जागोगे और जानोगे, उस दिन हैरान होगे कि बहुत बार ऐसा हुआ था।

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