बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग अपनाएं और संकटों से मुक्ति पाएं

आष्टांगिक अर्थात जीवन को सुधारने के 8 कदम। मोक्ष तक पहुंचने या गृहस्थ जीवन में सुखी रहने के 3 सरलतम मार्ग हैं- पहला आष्टांग योग, दूसरा जिन त्रिरत्न और तीसरा आष्टांगिक मार्ग। चौथा कोई मार्ग नहीं है। सभी मार्ग इन 3 से ही उत्प‍न्न होते हैं। बौद्ध धर्म मानता है कि यदि आप अभ्यास और जाग्रति के प्रति समर्पित नहीं हैं, तो कहीं भी पहुंच नहीं सकते हैं।

आष्टांगिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ इसलिए है कि यह हर दृष्टि से जीवन को शांतिपूर्ण और आनंदमय बनाता है। बुद्ध ने इस दुःख निरोध प्रतिपद आष्टांगिक मार्ग को ‘मध्यमा प्रतिपद’ या मध्यम मार्ग की संज्ञा दी है अर्थात जीवन में संतुलन ही मध्यम मार्ग पर चलना है।

वर्तमान जीवन में क्यों आवश्यक आष्टांगिक मार्ग?

बौद्ध इसे ‘काल चक्र’ कहते हैं अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है। आज आपका जो व्यवहार है वह बीते कल से निकला हुआ है। कुछ लोग हैं जिनके साथ हर वक्त बुरा होता रहता है तो इसके पीछे कार्य-कारण की अनंत श्रृंखला है। दुःख या रोग और सुख या सेहत सभी हमारे पिछले विचार और कर्म का परिणाम हैं।

पुनर्जन्म का कारण पिछला जन्म है। पिछले जन्म के कर्म चक्र पर आधारित यह जन्म है। बौद्ध धर्म के इस कर्म चक्र का संबंध वैसा नहीं है, जैसा कि माना जाता है कि हमारा भाग्य पिछले जन्म के कर्मों पर आधारित है या जैसी कि आम धारणा है पिछले जन्मों के पाप के कारण यह भुगतना पड़ रहा है। नहीं, कर्म चक्र का अर्थ प्रवृत्तियों की पुनरावृत्ति से और घटनाओं के दोहराव से है। बुरे घटनाक्रम से जीवन को धीरे-धीरे अच्छे घटनाक्रम के चक्र पर ले जाना ही आष्टांगिक मार्ग है।

समाधि प्राप्त करना हो या जीवन में सिर्फ सुख ही प्राप्त करना हो तो कर्म के इस चक्र को समझना आवश्यक है। मान लो किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया है तो उस अपराध की पुनरावृत्ति का वही समय होगा। आपके जीवन में जो दुःख जिस समय घटित हुआ है तो जानें उस समय को कि कहीं ठीक उसी समय वैसी ही परिस्थितियां तो निर्मित नहीं हो रही हैं? मन व शरीर हमेशा बाहरी घटनाओं से प्रतिक्रिया करते हैं इसे समझें। क्या इससे अशुभ की उत्पत्ति हो रही है या की शुभ की? बौद्ध धर्म कहता है कि हम सिर्फ मुक्ति का मार्ग बता सकते हैं, उस पर चलना या नहीं चलना आपकी मर्जी है। यह भी जान लें कि चलकर ही मंजिल पाई जाती है, तो जानिए अद्भुत आष्टांगिक मार्ग को. ‘आष्टांगिक’ अर्थात जीवन को सुधारने के 8 कदम।

1. सम्यक दृष्टि : दृष्टि को दो अर्थों में ले सकते हैं। पहला सोचना-समझना और कल्पना करना, दूसरा देखना। देखने से हमारी ऊर्जा का ज्यादा क्षय होता है और उससे ज्यादा सोचने से।

पहला : सम्यक दृष्टि अर्थात सही दृष्टि। इसे यथार्थ को समझने की दृष्टि भी कह सकते हैं। सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि हम जीवन के दुःख और सुख का सही अवलोकन करें। आर्य सत्यों को समझें। प्रैक्टिकल बनें। बुद्धि पर क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, काम, प्रमाद (बेहोशी) आदि प्रवृत्तियों को हावी न होने दें।

दूसरा : सम्यक दृष्टि का यह भी अर्थ है कि आप जितनी दूर और देर तक देखते हैं उतने पास और देर तक भी देखें। आंखों का इस्तेमाल अच्छे से और सही तरीके से करें। अति न करें, मध्यम मार्ग अपनाएं। अर्थात हद से ज्याद टीवी देखना, कम्प्यूटर पर कार्य करना और 17-17 घंटे तक जागना घातक है। देखने में संतुलन लाएं। आंखों से इतना अधिक कार्य न लें कि वे कमजोर होने लगे।

2. सम्यक संकल्प : जीवन में संकल्पों का बहुत महत्व है। संकल्प से रहित मनुष्य मृत व्यक्ति के समान है। यदि दुःख से छुटकारा पाना हो तो दृढ़ निश्चय कर लें कि आर्य सत्य मार्ग पर चलना है। मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना ही सम्यक संकल्प का ध्येय है।

शुरुआत करें छोटे-छोटे संकल्पों से। योग में इसे तप कहा गया है। आत्मसंयम का नाम है तप। हां, कड़े संकल्प न लें। सम्यक ही लें। नया संकल्प लेकर जीवन की नई शुरुआत करें।

यदि आप अपने जीवन में सेहत प्राप्त करना चाहते हैं तो संकल्प जरूरी है। जैसे तोंद निकल गई लेकिन फिर भी आप भोजन के प्रति आसक्त हैं। परीक्षा पास करना है लेकिन आप नींद की गिरफ्‍त में हैं। कोई सा भी कार्य करना है लेकिन आप में उस कार्य को करने का संकल्प नहीं है तो ये बस खयाली पुलाव ही बनकर रह जाएंगे। त्याग तो करना ही होगा।

3. सम्यक वाक् : जीवन में वाणी की पवित्रता और सत्यता होना आवश्यक है। यदि वाणी की पवित्रता और सत्यता नहीं है तो दुःख निर्मित होने में ज्यादा समय नहीं लगता। ऐसी बातें न करें जिससे खुद का और दूसरे का मन खराब हो। मन के खराब होने से शरीर भी खराब होगा। वाक् शक्ति पर नियंत्रण रखें।

सम्यक वाक् के और भी कई अर्थ हैं, जैसे न ज्यादा बोलें और न कम। जितने की जरूरत हो उतना ही बोलें। व्यर्थ का ज्ञान बांटने या किसी बहस में पड़ने का कोई लाभ नहीं, यह मन और मस्तिष्क के साथ शरीर का भी क्षरण करता है।

4. सम्यक कर्मांत : सम्यक कर्मांत का पहला अर्थ यह कि कोई भी हानिकारक कार्य न करें और दूसरा यह कि किसी भी कार्य को हाथ में लेकर उसे कुशलतापूर्वक करते हुए उसका समापन करें। सफलता प्राप्त करनी है तो सुंदर कार्यों और कर्मों का चयन करें। कुशलतापूर्वक और सुंदर तरीके से कार्य को शुरू करें और उसी तरह उसका समापन भी करें। किसी भी कार्य को अपूर्ण अवस्था में न छोड़ें।

हानिकारक कर्म क्या है? हानिकारक कर्म नहीं करना ही सम्यक कर्मांत है। बुद्ध कहते हैं कि कर्म चक्र से छूटने के लिए आचरण की शुद्धि होना जरूरी है। आचरण की शुद्धि क्रोध, द्वेष और दुराचार आदि का त्याग करने से होती है।

आप खुद ही सोचें कि हानिकारक कर्म क्या है। आप किसी भी प्रकार का नशा कर रहे हैं या किसी पर मन, वचन या कर्म से हिंसा कर रहे हैं तो यह हानिकारक कर्म है। किसी को बुरे वचन कहना या खुद के बारे में बुरा सोचना भी हानिकारक कर्म है। हर तरह का दुष्कर्म करना हानिकारक कर्म है। मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे दुराचार और भोग- विलास से दूर रहना चाहिए।

5. सम्यक आजीव : गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना ही सम्यक आजीव है। यदि आपने दूसरों का हक मारकर या अन्य किसी अन्यायपूर्ण उपाय से जीवन के साधन जुटाए हैं तो इसका परिणाम भी भुगतना होगा इसीलिए न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन आवश्यक है।

बहुत साफ-सुथरा और पवित्र आजीविका अर्जित करनी चाहिए। अनैतिक तरीके से अपनी आजीविका अर्जित नहीं करनी चाहिए। कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना ही सम्यक आजीव है।

अनैतिक तरीके क्या है : रिश्वत लेना, ब्याज लेना, अनैतिक कार्यों की दलाली, शराब-व्यापार, जुआ, सट्टा, झूठ बोलकर कोई वस्तु बेचना, नकली खाद्य पदार्थ बेचना, झूठ बोलकर पैसा ऐंठना, ठगी आदि अनेक प्रकार के अनैतिक कार्य हैं। यह तय है कि इन सभी प्रकार के बुरे कार्यों के परिणाम भी भुगतने ही पड़ते हैं। पाप की कमई दवाखाने, पागलखाने या जेलखाने में में गवईं।

6. सम्यक व्यायाम : सम्यक व्यायाम के भी दो अर्थ हैं- पहला यह कि ऐसा प्रयत्न करें जिससे शुभ की उत्पत्ति और अशुभ का निरोध हो। जीवन में शुभ के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। दूसरा यह कि शारीरिक व्यायाम करना लेकिन उतना ही जितने से शरीर स्वस्थ रहे। बॉडी बनाने वाला व्यायाम नहीं। शरीर सबसे महत्वपूर्ण है। शरीर है, तो सब है। ‘पहला सुख निरोगी काया’।

हालांकि मानव का संपूर्ण अस्तित्व सिर्फ उसके शरीर में सीमित नहीं होता। शरीर के अलावा उसके मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष में भी निहित होता है इसलिए मानसिक व्यायाम और आत्मिक व्यायाम भी करना जरूरी है। सकारात्मक विचारों और ध्यान से यह संभव होता है।

7. सम्यक स्मृति : चित्त में एकाग्रता का भाव आता है शारीरिक तथा मानसिक भोग-विलास की वस्तुओं से स्वयं को दूर रखने से। यह संभव होता है उपरोक्त बताए गए मार्ग से। एकाग्रता से विचार और भावनाएं स्थिर होकर शुद्ध बनी रहती हैं। इस शुद्धता को ही सम्यक स्मृति कहते हैं। सम्यक स्मृति का अर्थ वस्तुओं के वास्तविक रूप के संबंध में जागरूक रहना है।
व्यक्ति अज्ञानतावश इस शरीर, मन, बुद्धि आदि को ही सब कुछ समझता रहता है। वह इसे स्थायी समझता है जबकि यह नाशवान है। इसके नाशवान होने की कल्पना से ही वह दुखी हो जाता है। दुख को छोड़कर सच्चे आत्मज्ञान ही अनुभूति होना ही सम्यक स्मृति है। सम्यक स्मृति का अर्थ यह ‍भी है कि आप खुद ही खुद के हैं, कोई आपका नहीं है। सभी कुछ समय के लिए साथ हैं, चाहे वे आपके माता-पिता हों या पत्नी, बेटा हो या मित्र। इसे गहराई से समझने वाले के मन में सम्यक स्मृति का विकास होता है।
दूसरा यह कि इंद्रियों द्वारा कुछ देखने, कुछ सुनने या गंध लेने से मन कुछ स्तरों में विभाजित हो जाता है। मन का एक भाग विषयी का रूप ले लेता है अर्थात यह भोग की कल्पना करता है और दूसरा भाग स्मृति बन जाता है। व्यक्ति इसके मायाजाल में फंस जाता है। सम्यक स्मृति इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है।

8. सम्यक समाधि : उपरोक्त 7 मार्गों के अभ्यास से चित्त की एकाग्रता द्वारा निर्विकल्प प्रज्ञा की अनुभूति होती है। यह समाधि ही धर्म के समुद्र में लगाई गई छलांग है। सम्यक समाधि। मन का निरोध होना। प्रथमत: इसमें मनुष्य निर्विचार अवस्था में हो जाता है फिर निर्भाव और अंत में निर्वाण।

सम्यक समाधि का अर्थ ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता शांत होती है तथा विचारों का भटकाव रुक जाता है। ऐसा संभव होता है आर्य सत्य और आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने पर।

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