चलते रहो इसी में जीवन की पवित्रता हैः ओशो

मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में राम हूं। इन प्रतीकों को थोड़ा हम समझें। वायु इस जगत में सर्वाधिक स्वतंत्र है। और स्वतंत्रता ही पवित्रता है। वायु कहीं बंधी नहीं है, कहीं ठहरी नहीं है, कहीं उसका लगाव नहीं है, कहीं उसकी आसक्ति नहीं है।
वायु एक सतत गति है। तो पहली बात, जहां भी लगाव होगा, वहीं अपवित्रता शुरू हो जाएगी। जहां भी आसक्ति होगी, जहां भी ठहरने का मन होगा, जहां पड़ाव मंजिल बन जाएगा, वही अपवित्रता शुरू हो जाएगी।
जीवन की सारी दुर्गंध, जीवन की सारी कुरूपता, जहां-जहां हम ठहर जाते हैं और जकड़ जाते हैं, वहीं से पैदा होती है। जीवन जहां भी प्रवाह को खो देता है, गति को खो देता है और जहां ठहर जाता है, जड़ हो जाता है…।
जैसे नदी बहती है, तो नदी पवित्र होती है। और डबरा बहता नहीं, अपवित्र हो जाता है। डबरे में भी वही जल है, जो नदी में है। लेकिन नदी में प्रवाह है, बहाव है, जीवन है। डबरा मृत है, मुर्दा है, कोई गति नहीं है। डबरा सड़ता है, दुर्गंधित होता है और नष्ट होता है। स्वभावतः, अपवित्र हो जाता है। कृष्ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु हूं।
पहली बात, पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां प्रवाह सतत हो। पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां कोई लगाव, जहां कोई रुकाव, जहां कोई ठहराव न आ जाए। पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां कोई फिक्सेशन, प्राणों का अवरुद्ध होना न हो। जिसके प्राण भी वायु की तरह हैं- कहीं ठहरे हुए नहीं, कहीं रुकते नहीं, कहीं बंधते नहीं, कहीं कोई आसक्ति निर्मित नहीं करते- वही केवल पवित्रता को उपलब्ध हो पाएगा।
प्राचीन समय से संन्यासी ने प्रवाहवत जीवन व्यतीत करने को कहा है। नदी की तरह बहते रहो। महावीर ने अपने संयासियों से कहा है कि वे तीन दिन से ज्यादा कहीं रुकें नहीं। तीन दिन के पहले हट जाएं। थोड़ा सोचने जैसा है। क्योंकि तीन दिन का यह राज महावीर को कैसे पता चला होगा, कहना मुश्किल है।
लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि आदमी को किसी भी जगह मन के लगने में कम से कम तीन दिन से ज्यादा का समय चाहिए। आप अगर एक नए कमरे में सोने जाएंगे, तो तीन रातें आपको थोड़ी-सी बेचैनी रहेगी, चैथी रात आप ठीक से सो पाएंगे। कहीं भी किसी नई स्थिति को पुराना बना लेने के लिए कम से कम तीन दिनों की जरूरत है। कम से कम। थोड़ा ज्यादा समय भी लग सकता है।
महावीर ने अपने संयासियों को कहा है कि वह तीन दिन से ज्यादा एक जगह न रुके। इसके पहले कि कोई अपना मालूम पड़ने लगे, उसे हट जाना चाहिए। क्योंकि जहां लगा कि कोई अपना है, वहीं जंजीर निर्मित हो जाती है। और जिसके प्राणों पर जंजीर पड़ जाती है, उन प्राणों में कुरूपता और दुर्गंध और सड़ांध शुरू हो जाती है। डबरा बनना शुरू हो गया प्राणों का।

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