मन पारा है

 प्रिय आनन्द ब्रह्म,

प्रेम । तुम्हारा ध्यान का अनुभव
बहुत सांकेतिक है ।

ध्यान गहराता है, तो एेसा ही
लगता है ।

जैसे कि मन पारा है—है भी और
छूता भी है । और फिर भी चिपकता नहीं
है ।

इसे और साधो ।

नये-नये द्वार खुलेंगे और नये-नये
साक्षात् होंगे ।

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रजनीश के प्रणाम
१०-३-१९७१

[प्रति : स्वामी आनंद ब्रह्म, पूना]

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