शब्दहीन सम्बाद में दीक्षा

 प्रिय ब्रह्मदत्त,

प्रेम । साथ ही हूँ तुम्हारे ।

बोलता भी हूँ ।

तुम सुनते भी हो ।

लेकिन, निश्चय ही अभी समझ
नहीं पाते हो ।

यह द्वार है नया ।

आयाम है अपरिचित ।

भाषा है अनजान ।

पर धैर्य रखो ।

‘धीरे-धीरे’ सब समझ पाओगे ।

शब्दहीन सम्बाद में दीक्षा दे रहा हूँ ।

मौन हो सुनते रहो ।

समझने की अभी चिन्ता ही न करो ।

क्योंकि, उससे भी मौन भंग होता है ।

और, मन गति करता है ।

अभी तो, बस सुनो ही ।

सुनने की गहराई ही समझने का
जन्म बनती है ।

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रजनीश के प्रणाम
२२-१-१९७१

[प्रति : श्री ब्रह्मदत्त, तारदेव, बम्बई-३४]

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