शून्य हो जाना ही ध्यान है – ओशो

न का कोई अनुभव नहीं होता। ध्यान अनुभव है भी नहीं, जब सब अनुभव समाप्त हो जाते हैं, तब जो शेष रह जाता है उसका नाम ध्यान है। ध्यान के न तो उथले अनुभव होते हैं न गहरे अनुभव होते हैं। ध्यान अनुभव का नाम ही नहीं है। जहां तक अनुभव है, वहां तक ध्यान नहीं है और जहां से ध्यान शुरू होता है वहां कहां अनुभव!!! अनुभव तो हमेशा बाहर-बाहर रह जाता है।
अनुभव का तो अर्थ है कि चेतना में कोई विषय-वस्तु है। और ध्यान का अर्थ है: विषय-वस्तु रहित चैतन्य। अगर लगे कि खूब सुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हुआ कि चेतना है और सुख का अनुभव है। सुख का अनुभव चेतना में खड़ा है या चेतना को घेरे है। चेतना तो भिन्ना है। चेतना तो वह है जिसे सुख का अनुभव हो रहा है। सुख का अनुभव चेतना नहीं है।
फिर ध्यान का कैसे अनुभव होगा? ध्यान का अनुभव होता ही नहीं। दर्पण है, दर्पण पर कोई प्रतिबिंब बनता है, तो अनुभव। और जब दर्पण पर कोई प्रतिबिंब नहीं बनता, दर्पण निराकार है, शून्य है – तब ध्यान। ज्ञान के अनुभव होते हैं, ध्यान के अनुभव नहीं होते। जहां तक अनुभव है, वहां तक मन है।
मन अनुभवों का जोड़ है। सुख के अनुभव, दुख के अनुभव, गहराइयों के अनुभव, ऊंचाइयों के अनुभव-सब अनुभव मन के भीतर हैं। और ध्यान अमन की दशा है, उन्मनी दशा है–जहां मन न रहा, जहां सब अनुभव गये, जहां एक शब्द भी उठता नहीं है, जहां एक विषय भी छाया नहीं डालता। उस निर्दोष, उस निर्मल चैतन्य का नाम ध्यान है।
स्वानुभव किसी भी विधि का अभ्यास किए बिना ही हुआ इसलिए कृष्णमूर्ति जब यह कह रहे हैं कि किसी विधि का अभ्यास मत करो, वह सहज ही घटित होता है-तब यह बात मुझे स्वाभाविक मालूम होती है।
अब समझना, किसी विधि का अभ्यास मत करो, यह एक विधि है। यह नकारात्मक विधि है। विधियां दो तरह की होती हैं-विधायक और नकारात्मक। विधायक विधि में कहा जाता है-इस विधि का अभ्यास करो, उस विधि का अभ्यास करो। नकारात्मक में कहा जाता है-किसी विधि का अभ्यास न करो।
इसका अर्थ क्या हुआ? अविधि का अभ्यास करो। अगर इसका ठीक-ठीक अर्थ समझो तो इसका अर्थ हुआ-अविधि का अभ्यास करो। विधि से बचो। विधि आये तो पकड़ो मत। विधि मिल भी जाए तो उपयोग मत करो। मगर यह नकारात्मक विधि हुई। यह कोई नई बात तो नहीं।
उपनिषद कहते हैं क्क नेति-नेति – न यह, न वह…। छोड़ते चलो, किसी विधि का अभ्यास न करो। बुद्ध ने तो नकार पर बड़ा जोर दिया है, कोई विधि नहीं! ईसाई फकीरों में एक वर्ग हुआ है, इकहार्ट और उन जैसे फकीरों का, जो कहते हैं–वॉया निगेटिव, नकार से मार्ग है, नहीं से द्वार है। यह भी एक विधि है। यह नकारात्मक विधि है।
मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि अगर विधि ही पकड़नी हो तो विधायक पकड़ना। क्योंकि विधायक विधि को छोड़ना आसान होगा, नकारात्मक विधि को छोड़ना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि पहले तो तुम यह समझोगे कि यह विधि ही नहीं है तो छोड़ने का सवाल ही न उठेगा।
एक झेन फकीर के पास उसका शिष्य आया। बीस वर्षों से श्रम कर रहा है। और फकीर ने कहा है – एक हाथ की ताली की आवाज कैसी होती है, इस पर ध्यान करो। अब एक हाथ की ताली की आवाज कुछ होती ही नहीं! ताली तो बजती दो हाथों से है। आवाज ही जब होगी तो दो हाथों से होगी।
दो टकराएंगे तो आवाज होगी, आवाज का अर्थ है टकराहट। एक हाथ की ताली कैसे बजेगी? बहुत तरह के उत्तर युवक खोज कर लाता रहा। लेकिन कोई उत्तर सही नहीं हो सकता। गुरु उतर सुनता ही नहीं था, वह पहले ही कह देता था – गलत! अभी उसने उत्तर बताया भी नहीं है। उसने एक दिन पूछा भी कि आप भी हैरान करते हैं मुझे! मैं खोजकर लाता हूं, महीनों की मेहनत के बाद…ध्यान करते-करते खोजता हूं कि यह उत्तर ठीक होगा, और मैं बोल भी नहीं पाता और आप…दरवाजे के भीतर आता हूं, कह देते हैं–गलत, यह भी गलत!
गुरु ने कहा कि सभी उत्तर गलत हैं। इसलिए पूछने और सुनने की जरूरत क्या है? उत्तर तुम जब तक लाते रहोगे तब तक गलत! जिस दिन तुम शून्य आओगे, निरुत्तर आओगे, यह जानकर आओगे कि कोई उत्तर नहीं है, शून्य का अनुभव करके आओगे, उस दिन कुछ बात बनेगी।
बीस साल लंबे श्रम के बाद शून्य का अनुभव हुआ। बीस वर्ष…लंबी साधना थी। आधी उमर निकल गई। लेकिन घटना आधी घटी। आधी रात थी जब यह घटना घटी; मगर सुबह तक वह प्रतीक्षा न कर सका। यह समाचार तो गुरु को अभी देना है। बीस वर्ष से वे भी प्रतीक्षा करते हैं। और आज वह शुभ घड़ी आ गई कि मैं जा कर निवेदन कर दूं।
वह भागा…आधी रात में जाकर द्वार खटखटाए। गुरु के चरणों पर गिर पड़ा। गुरु ने एक नजर उसकी तरफ देखा और कहा – जा बाहर, इसको भी फेंक कर आ! उस युवक ने कहा। किसको फेंक कर आऊं? अब तो कुछ बचा नहीं है। शून्य का अनुभव हुआ है।
गुरु ने कहा – बस…बाहर जा। शून्य का कहीं अनुभव होता है! और जिसका अनुभव हो जाए वह शून्य न रहा। शून्य भी अगर अनुभव हो जाए, तो शून्य नहीं रहा। अब तुझे शून्य को छोड़ना पड़ेगा। अब तू शून्य को भी छोड़ दे, तब तू सच में शून्य हो जाएगा।
नकारात्मक विधि का यही खतरा है कि वह पहले से ही नकार है अब वह युवक सिर धुनने लगा और कहने लगा कि यह तो बड़ी मुश्किल हो गयी! कुछ हो तो छोड़ना आसान है, अब शून्य को कैसे छोडूं? शून्य कुछ है तो नहीं जिसे छोडूं!
नकारात्मक विधि से जो चलेगा, वह अड़चन में पड़ेगा एक दिन। अड़चन यह आयेगी कि जब नकारात्मक विधि छोड़नी पड़ेगी तो क्या छोड़ोगे?
पहले तो यह समझ लेना कि नकारात्मक विधि भी विधि है। कृष्णमूर्ति कहते हैं, किसी विधि का अभ्यास मत करो। यह तो विधान हो गया। यह तो आज्ञा हो गई। यह तो आदेश हो गया। अनुशासन दे दिया गया–किसी विधि का अभ्यास मत करो! यह विधि है। अविधि का अभ्यास, या विधि का अनभ्यास–जो भी नाम देना चाहो दे लो।

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