युद्ध से खुलता है विकास का द्वार : ओशो

मैंने सुना है कि एक आदमी कोई वाद्ययंत्र बजाता था। वह तार पर एक ही जगह उंगली रखकर घंटों उसी को रगड़ता रहता। उसकेघर के लोग तो परेशान हो ही गए थे, उसके पास-पड़ोस केलोग भी परेशान हो गए थे। कई लोगों ने उससे प्रार्थना की कि हमने बहुत वाद्य बजाने वाले देखे, लेकिन सभी का हाथ सरकता है, सभी के भिन्ना स्वर निकलते हैं, तुमने यह क्या राग ले रखा है? तो उस आदमी ने कहा, वह अभी ठीक स्थान खोज रहे हैं, मैंने ठीक स्थान पा लिया है। तो मैं अब एक ठीक स्थान पर रुका हुआ हूं। मुझे अब कोई खोज की जरूरत नहीं है।
हमारा मन कर सकता है कि हम एक ही स्वर चुन लें जीवन का। लेकिन एक ही स्वर सिर्फ मृत्यु में हो सकता है। जीवन विरोधी स्वरों पर ही खड़ा होगा। तुमने अगर कभी किसी मकान के दरवाजे पर ‘आर्क” बना देखा हो, तो उसमें विरोधी ईंटें दोनों तरफ से लाकर हम मकान के द्वार पर अड़ा देते हैं। विरोधी ईंटें एक-दूसरे के विरोध में खड़े होने की वजह से भवन को उठा लेती हैं। कोई सोच सकता है कि ईंटें एक ही दिशा में लगा दी जाएं। फिर भवन गिरेगा, फिर भवन बनेगा नहीं।
जीवन की सारी व्यवस्था विरोधी स्वरों के तनाव पर है। युद्ध भी उस तनाव का हिस्सा है। युद्ध ने नुकसान ही पहुंचाए, ऐसा जो सोचते हैं, वह गलत सोचते हैं, वह अधूरा देखते हैं। अगर हम मनुष्यता के विकास को समझने चलें तो हमें पता चलेगा। मनुष्यता के विकास का अधिकतम हिस्सा युद्धों के माध्यम से हुआ है।
आज मनुष्य के पास जो कुछ है वह सब उसने प्राथमिक रूप से युद्धों में खोजा है। अगर आज हमें दिखाई पड़ते हैं कि सारी पृथ्वी पर रास्ते हैं, तो पहली दफे रास्ते युद्धों के लिए बने थे, फौजों को भेजने केलिए बने थे। वह दो आदमियों को मिलाने के लिए नहीं बने थे, बारात ले जाने के लिए नहीं बने थे, वह युद्ध के लिए बने थे पहली बार।
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जितने भी साधन हैं–अगर आज हम बड़े मकान देख रहे हैं, तो पहले बड़ा मकान नहीं बना था, बड़ा किला बना था और वह युद्ध की जरूरत थी। पहली दीवार दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए बनाई गई। फिर दीवारें बनीं, फिर अब आकाश को छूते हुए मकान हैं। आज हम सोच भी नहीं सकते कि आकाश को छूता हुआ मकान युद्ध की जरूरत है। मनुष्य के पास जितनी भी संपन्नाता है और जितने भी साधन हैं और जितना भी वैज्ञानिक आविष्कार है, वह सब युद्ध के माध्यम से हुआ।
असल में युद्ध ऐसे तनाव की स्थिति पैदा कर देता है, ऐसी चुनौती कि हमारे भीतर जो सोयी शक्तियां हैं, उन सबको जागकर सक्रिय होना पड़ता है। शांति के क्षण में हम आलस्य में हो सकते हैं, तमस में हो सकते हैं, युद्ध हमारे राजस को उभारता है। हमारे भीतर सोयी हुई शक्तियों को चुनौती के मौकेपर उठना ही पड़ता है।
इसलिए युद्ध के क्षण में हम साधारण नहीं रह जाते, हम असाधारण हो जाते हैं। और मनुष्य का मस्तिष्क अपनी पूरी शक्ति से काम करने लगता है। युद्ध में एक छलांग लग जाती है मनुष्य की प्रतिभा की, जो कि शांति के कालों में, वर्षों में, सैकड़ों वर्षों में नहीं लग पाती।
अनेक लोगों का ऐसा खयाल है कि अगर कृष्ण ने महाभारत का युद्ध रोका होता तो भारत बहुत संपन्न होता। भारत ने बड़े विकास के शिखर छू लिए होते। बात इससे बिलकुल उलटी है। अगर कृष्ण जैसे दस-पांच लोग भारत के इतिहास में हमें मिले होते और हमने एक महाभारत नहीं, दस-पांच महाभारत लड़े होते तो हम विकास के शिखरों पर होते।
महाभारत को हुए अंदाजन पांच हजार से ज्यादा वर्ष हुए होंगे। पांच हजार वर्षों में फिर हमने कोई बड़ा युद्ध नहीं किया। बाकी हमारी लड़ाइयां बहुत दिवालिया, ‘बैंकरप्ट” हैं। बाकी हमारी लड़ाइयों की बड़ी कोई कीमत नहीं है। वे छोटे-मोटे झगड़े हैं। उनको युद्ध कहना भी ठीक नहीं है।
पांच हजार वर्षों से हमने कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। अगर युद्ध की वजह से हानि होती है और विध्वंस होता है, तो हमें पृथ्वी पर सबसे ज्यादा संपन्न और विकासमान होना चाहिए था। लेकिन हालतें उलटी हैं। जिन मुल्कों ने युद्ध लड़े हैं, वे बहुत विकासमान हैं और बहुत संपन्न हैं।
पहले महायुद्ध के बाद लोग सोच सकते थे कि जर्मनी अब सदा के लिए टूट जाएगा, लेकिन दूसरे महायुद्ध में जर्मनी पहले महायुद्ध के जर्मनी से अनंतगुना शक्तिशाली होकर प्रगट हुआ-सिर्फ बीस साल के फासले पर।
कोई सोच भी नहीं सकता था कि पहले महायुद्ध के बाद दूसरा महायुद्ध जर्मनी कर सकेगा। दो-चार सौ साल तक भी कर सकेगा, इसकी भी संभावना नहीं थी। लेकिन बीस साल में जर्मनी अनंतगुना शक्तिशाली होकर बाहर आ गया। पहले महायुद्ध ने उसकी शक्तियों को जिस तीव्रता पर पहुंचा दिया, उस तीव्रता का उसने उपयोग कर लिया।
अभी पिछले दूसरे महायुद्ध में लगता था कि अब शायद युद्ध कभी होना बहुत मुश्किल हो जाएगा, और जो देश सबसे ज्यादा मिटे थे-जर्मनी और जापान-वह दोनों के दोनों फिर संपन्न होकर खड़े हो गए। आज जापान को देखकर कोई कह सकता है कि बीस साल पहले एटम बम इसी मुल्क पर गिरा था? आज जापान को देखकर कोई नहीं कह सकता। हिंदुस्तान को देखकर जरूर हम कह सकते हैं कि यहां एटम बम गिरते ही रहे होंगे। हमारी दुर्दशा देखकर लगता है कि यहां जैसे युद्ध होता ही रहा होगा।
महाभारत के कारण हिंदुस्तान का अहित नहीं हुआ। महाभारत की छाया में हिंदुस्तान में जो शिक्षक पैदा हुए, वे सब युद्ध-विरोधी थे। और उन्होंने महाभारत का शोषण किया। और कहा कि ऐसा युद्ध और ऐसी हिंसा। नहीं, अब न युद्ध करना है, न ही अब हिंसा करनी है। अब लड़ना नहीं है। महाभारत के पीछे कृष्ण की क्षमता केव्यक्तियों की श्रंखला नहीं हम पैदा कर पाए।
अन्यथा महाभारत में जिस ऊंचाई को हमारे देश की चेतना की लहर ने छुआ था, हम हर बार उससे ज्यादा ऊंचाई की लहर को छू सकते थे। और शायद आज हम पृथ्वी पर सबसे ज्यादा संपन्ना और सबसे ज्यादा विकसित समाज होते।
यह भी सोचने जैसा है कि महाभारत जैसा युद्ध विपन्ना समाजों में घटित नहीं होता। युद्ध के लिए भी संपन्ना होना जरूरी है। और संपन्नाता के लिए भी युद्ध का घटना जरूरी है। असल में वह चुनौती के क्षण हैं।
कृष्ण ने जिस युद्ध में हमें उतारा था, वह युद्ध में अगर हम सतत उतरे होते…क्योंकि इसे हम सोचें, आज करीब-करीब पश्चिम उस जगह है जहां महाभारत के दिनों में हम पहुंच गए थे।
आज जितने अस्त्रों-शस्त्रों की बात है, करीब-करीब वे सभी अस्त्र-शस्त्र किसी-न-किसी रूप में महाभारत में प्रयोग किए गए। बड़ा संपन्ना, बड़ा प्रतिभाशाली और बहुत वैज्ञानिक उन्नात शिखर था। उस युद्ध से कुछ हानि नहीं हो गई। उस युद्ध के बाद यह निराशा का क्षण हमें पकड़ा।
उस निराशा के क्षण का दुरुपयोग हुआ। उस निराशा के क्षण ने पश्चिम में भी पकड़ा है कुछ को। पश्चिम भी भयभीत हो गया है। और पश्चिम का अगर पतन होगा, तो वह पश्चिम में जो शांतिवादी है उसकी वजह से होगा। अगर पश्चिम ने शांतिवादी की बात मान ली, तो पश्चिम पतित हो जाएगा। वह वहीं पहुंच जाएगा, जहां महाभारत के बाद हम पहुंचे।
हिंदुस्तान ने शांतिवादी की बात मान ली। इसलिए पांच हजार वर्ष का लंबा चक्कर चला। इसे थोड़ा सोचना जरूरी है। कृष्ण युद्धवादी नहीं हैं, लेकिन युद्ध को भी जीवन के खेल का हिस्सा मानते हैं।
युद्धखोर नहीं हैं, किसी को मिटाने की कोई आकांक्षा नहीं है, किसी को दुख देने का कोई खयाल नहीं है, युद्ध न हो उसके सारे उपाय उन्होंने कर लिए थे, लेकिन, जीवन की और सत्य की और धर्म की कीमत पर युद्ध को बचाने के लिए राजी न थे। आखिर किसी भी चीज के बचाने की एक सीमा है।

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