जब 'मन' नहीं होता तब होता है ध्यान Osho

मन के माध्यम से ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं ‘मन’ नहीं हूं। ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है। जहां न विचार होता है, न कोई विषय। साधारणत: हमारी चेतना विचारों से, विषयों से, कामनाओं से आच्छादित रहती है।
जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है। विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है। स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलता और कोई कामना सिर नहीं उठाती। जब मन नहीं होता, तब ध्यान होता है।
मन के माध्यम से ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं ‘मन’ नहीं हूं। जब मन में कुछ भी चलता नहीं, उन शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है।
धीरे-धीरे ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है। मन असहज अवस्था है, जिसे हमने पा लिया है। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है।
मगर इसे पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंखों में झांकें, वहां आपको अद्भुत मौन और निर्दोषता दिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए है लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने पड़ते हैं। विचार करना, तर्क करना, शब्द, भाषा, व्याकरण सब। धीरे-धीरे वह अपनी सरलता से दूर हटता जाएगा।
उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। उस निर्दोष सहजता को पुन: पाने की जरूरत है। हम उसे भूल गए हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है लेकिन हम जरा खोदें, तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है क्योंकि वह हमारा स्वभाव है।

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